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7.1 अल-आराफ़    [ कुल आयतें - 206 ]

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सुरु अल्लाह के नाम से
जो बड़ा कृपाशील अत्यन्त दयावान है।
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●═══════════════════✒
☆   अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ साद॰ (1)
_______________________________
☆    यह एक किताब है, जो तुम्हारी ओर उतारी गई है - अतःइससे तुम्हारे सीने में कोई तंगी न हो - ताकि तुम इसके द्वारा सचेत करो और यह ईमानवालों के लिए एक प्रबोधन है; (2)
_______________________________
☆     जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी ओर अवतरित हुआ है, उस पर चलो और उसे छोड़कर दूसरे संरक्षक मित्रों का अनुसरण न करो। तुम लोग नसीहत थोड़े ही मानते हो। (3)
_______________________________
☆    कितनी ही बस्तियाँ थीं, जिन्हें हमने विनष्ट कर दिया। उनपर हमारी यातना रात को सोते समय आ पहुँची या (दिन-दहाड़े) आई, जबकि वे दोपहर में विश्राम कर रहे थे। (4)
_______________________________
☆    जब उनपर हमारी यातना आ गई तो इसके सिवा उनके मुँह से कुछ न निकला कि वे पुकार उठे,"वास्तव में हम अत्याचारी थे।" (5)
_______________________________
☆    अतः हम उन लोगों से अवश्य पूछेंगे, जिनके पास रसूल भेजेगए थे, और हम रसूलों से भी अवश्य पूछेंगे। (6)
_______________________________
☆     फिर हम पूरे ज्ञान के साथ उनके सामने सब बयान कर देंगे।हम कहीं ग़ायब नहीं थे। (7)
_______________________________
☆    और बिल्कुल पक्का-सच्चा वज़न उसी दिन होगा। अतः जिनकेकर्म वज़न में भारी होंगे, वही सफलता प्राप्त करेंगे। (8)
_______________________________
☆    और वे लोग जिनके कर्म वज़न में हलके होंगे, तो वही वे लोगहैं, जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला, क्योंकि वे हमारी आयतों का इनकार औऱ अपनेऊपर अत्याचार करते रहे। (9)
_______________________________
☆    और हमने धरती में तुम्हें अधिकार दिया और उसमें तुम्हारे लिए जीवन-सामग्री रखी। तुम कृतज्ञता थोड़े ही दिखाते हो। (10)
_______________________________
☆   हमने तुम्हें पैदा करने का निश्चय किया; फिर तुम्हारा रूप बनाया; फिर हमने फ़रिश्तों से कहा, "आदम को सजदा करो।" तो उन्होंने सजदा किया, सिवाय इबलीस के। वह (इबलीस) सजदा करनेवालों में से न हुआ। (11)
_______________________________
☆    कहा, "तुझे किसने सजदा करने से रोका, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था?" बोला,"मैं उससे अच्छा हूँ। तूने मुझे अग्नि से बनाया और उसे मिट्टी से बनाया।" (12)
_______________________________
☆    कहा, "उतर जा यहाँ से! तुझे कोई हक़ नहीं है कि यहाँ घमंड करे, तो अब निकल जा; निश्चय ही तू अपमानित है।" (13)
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☆    बोला, "मुझे उस दिन तक मुहलत दे, जबकि लोग उठाए जाएँगे।" (14)
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☆    कहा, "निस्संदेह तुझे मुहलत है।" (15)
_______________________________
☆    बोला, "अच्छा, इस कारण कि तूने मुझे गुमराही में डाला है, मैं भी तेरे सीधे मार्ग परउनके लिए घात में अवश्य बैठूँगा। (16)
_______________________________
☆     फिर उनके आगे और उनके पीछे और उनके दाएँ और उनके बाएँ से उनके पास आऊँगा। और तू उनमें अधिकतर को कृतज्ञ न पाएगा।" (17)
_______________________________
☆     कहा, "निकल जा यहाँ से! निन्दित ठुकराया हुआ। उनमें से जिस किसी ने भी तेरा अनुसरण किया, मैं अवश्य तुम सबसे जहन्नम को भर दूँगा।" (18)
_______________________________
☆     और "ऐ आदम! तुम और तुम्हारीपत्नी दोनों जन्नत में रहो-बसो, फिर जहाँ से चाहो खाओ, लेकिन इस वृक्ष के निकट नजाना, अन्यथा अत्याचारियों में से हो जाओगे।" (19)
_______________________________
☆    फिर शैतान ने दोनों को बहकाया, ताकि उनकी शर्मगाहों को, जो उन दोनों से छिपी थीं, उन दोनों के सामने खोल दे। और उसने (इबलीस ने) कहा,"तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस वृक्ष से रोका है, तो केवल इसलिए कि ऐसा न हो कि तुमकहीं फ़रिश्ते हो जाओ या कहींऐसा न हो कि तुम्हें अमरता प्राप्त हो जाए।" (20)
_______________________________
☆   और उसने उन दोनों के आगे क़समें खाईं कि "निश्चय ही मैं तुम दोनों का हितैषी हूँ।" (21)
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☆    इस प्रकार धोखा देकर उसने उन दोनों को झुका लिया। अन्ततः जब उन्होंने उस वृक्ष का स्वाद लिया, तो उनकी शर्मगाहें एक-दूसरे के सामने खुल गईं और वे अपने ऊपर बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम दोनों को इस वृक्ष से रोका नहीं था और तुमसे कहा नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला शत्रु है?" (22)
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☆    दोनों बोले, "हमारे रब! हमने अपने आप पर अत्याचार किया। अब यदि तूने हमें क्षमान किया और हम पर दया न दर्शाई, फिर तो हम घाटा उठानेवालों में से होंगे।" (23)
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☆    कहा, "उतर जाओ! तुम परस्पर एक-दूसरे के शत्रु हो और एक अवधि तक तुम्हारे लिए धरती में ठिकाना और जीवन-सामग्री है।" (24)
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☆     कहा, "वहीं तुम्हें जीना और वहीं तुम्हें मरना है और उसी में से तुमको निकाला जाएगा।" (25)
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☆    ऐ आदम की सन्तान! हमने तुम्हारे लिए वस्त्र उतारा है जो तुम्हारी शर्मगाहों को छुपाए और रक्षा और शोभा का साधन हो। और धर्मपरायणता का वस्त्र - वह तो सबसे उत्तम है, यह अल्लाह की निशानियों में से है, ताकि वे ध्यान दें। (26)
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☆  ऐ आदम की सन्तान! कहीं शैतान तुम्हें बहकावे में न डाल दे, जिस प्रकार उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत सेनिकलवा दिया था; उनके वस्त्र उनपर से उतरवा दिए थे, ताकि उनकी शर्मगाहें एक-दूसरे के सामने खोल दे। निस्संदेह वह और उसका गरोह उस स्थान से तुम्हें देखता है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देखते। हमने तो शैतानों को उन लोगों का मित्र बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते। (27)
_______________________________
☆    और उनका हाल यह है कि जब वे लोग कोई अश्लील कर्म करते हैंतो कहते हैं कि "हमने अपने बाप-दादा को इसी तरीक़े पर पाया है और अल्लाह ही ने हमें इसका आदेश दिया है।" कह दो,"अल्लाह कभी अश्लील बातों का आदेश नहीं दिया करता। क्या अल्लाह पर थोपकर ऐसी बात कहतेहो, जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं?" (28)
_______________________________
☆     कह दो, "मेरे रब ने तो न्याय का आदेश दिया है और यह कि इबादत के प्रत्येक अवसर परअपना रुख़ ठीक रखो और निरे उसी के भक्त एवं आज्ञाकारी बनकर उसे पुकारो। जैसे उसने तुम्हें पहली बार पैदा किया, वैसे ही तुम फिर पैदा होगे।" (29)
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☆    एक गरोह को उसने मार्ग दिखाया। परन्तु दूसरा गरोह ऐसा है, जिसके लोगों पर गुमराही चिपककर रह गई। निश्चय ही उन्होंने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपने मित्र बनाए और समझते यह हैं कि वे सीधे मार्ग पर हैं। (30)
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☆   ऐ आदम की सन्तान! इबादत के प्रत्येक अवसर पर शोभा धारण करो; खाओ और पियो, परन्तु हद से आगे न बढ़ो। निश्चय ही, वह हद से आगे बढ़नेवालों को पसन्दनहीं करता। (31)
_______________________________
☆   कहो, "अल्लाह की उस शोभा को जिसे उसने अपने बन्दों के लिएउत्पन्न किया है और आजीविका की पवित्र, अच्छी चीज़ों को किसने हराम कर दिया?" कह दो,"ये सांसारिक जीवन में भी ईमानवालों के लिए हैं; क़ियामत के दिन तो ये केवल उन्हीं के लिए होंगी। इसी प्रकार हम आयतों को उन लोगों के लिए सविस्तार बयान करते हैं, जो जानना चाहें।"(32)
_______________________________
☆    कह दो, "मेरे रब ने केवल अश्लील कर्मों को हराम किया है - जो उनमें से प्रकट हो उन्हें भी और जो छिपे हों उन्हें भी - और हक़ मारना, नाहक़ ज़्यादती और इस बात को कि तुम अल्लाह का साझीदार ठहराओ, जिसके लिए उसने कोई प्रमाण नहीं उतारा और इस बात को भी कि तुम अल्लाह पर थोपकर ऐसी बात कहो जिसका तुम्हें ज्ञान न हो।" (33)
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☆    प्रत्येक समुदाय के लिए एक नियत अवधि है। फिर जब उनका नियत समय आ जाता है, तो एक घड़ी भर न पीछे हट सकते हैं औरन आगे बढ़ सकते हैं।(34)
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☆    ऐ आदम की सन्तान! यदि तुम्हारे पास तुम्हीं में से कोई रसूल आएँ; तुम्हें मेरी आयतें सुनाएँ, तो जिसने डर रखा और सुधार कर लिया तो ऐसे लोगों के लिए न कोई भय होगा औरन वे शोकाकुल होंगे। (35)
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☆    रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनके मुक़ाबले में अकड़ दिखाई; वही आगवाले हैं, जिसमें वे सदैव रहेंगे। (36)
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☆    अब उससे बढ़कर अत्याचारी कौन है, जिसने अल्लाह पर मिथ्यारोपण किया या उसकी आयतों को झुठलाया? ऐसे लोगों को उनके लिए लिखा हुआ हिस्सा पहुँचता रहेगा, यहाँ तक कि जब हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनके प्राण ग्रस्त करने के लिए उनके पास आएँगे तो कहेंगे, "कहाँ हैं, वे जिन्हेंतुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते थे?" कहेंगे, "वे तो हमसे गुम हो गए।" और वे स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देंगे कि वास्तव में वे इनकार करनेवाले थे। (37)
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☆    वह कहेगा, "जिन्न और इनसान के जो गरोह तुमसे पहले गुज़रेहैं, उन्हीं के साथ सम्मिलित होकर तुम भी आग में प्रवेश करो।" जब भी कोई जमाअत प्रवेश करेगी, तो वह अपनी बहन पर लानतकरेगी, यहाँ तक कि जब सब उसमेंरल-मिल जाएँगे तो उनमें से बाद में आनेवाले अपने से पहलेवाले के विषय में कहेंगे,"हमारे रब! हमें इन्हीं लोगों ने गुमराह किया था; तो तू इन्हें आग की दोहरी यातना दे।" वह कहेगा, "हरेक के लिए दोहरी ही है। किन्तु तुम नहींजानते।" (38)
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☆    और उनमें से पहले आनेवाले अपने से बाद में आनेवालों से कहेंगे, "फिर हमारे मुक़ाबले में तुम्हें कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं, तो जैसी कुछ कमाई तुम करते रहे हो, उसके बदले में तुम यातना का मज़ा चखो!" (39)
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☆    जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और उनके मुक़ाबले में अकड़ दिखाई, उनके लिए आकाश के द्वार नहीं खोले जाएँगे और न वे जन्नत में प्रवेश करेंगे जब तक कि ऊँट सुई के नाके में से न गुज़र जाए। हम अपराधियों को ऐसा ही बदला देते हैं। (40)
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☆   उनके लिए बिछौना जहन्नम का होगा और ओढ़ना भी उसी का। अत्याचारियों को हम ऐसा ही बदला देते हैं। (41)
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☆    इसके विपरित जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए - हम किसी पर उसकी सामर्थ्य से बढ़कर बोझ नहीं डालते - वही लोग जन्नतवाले हैं। वे उसमें सदैव रहेंगे। (42)
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☆    उनके सीनों में एक-दूसरे के प्रति जो रंजिश होगी, उसे हम दूर कर देंगे; उनके नीचें नहरें बह रही होंगी और वे कहेंगे, "प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने इसकी ओर हमारा मार्गदर्शन किया। और यदि अल्लाह हमारा मार्गदर्शन न करता तो हम कदापि मार्ग नहीं पा सकते थे। हमारे रब के रसूल निस्संदेह सत्य लेकर आए थे।" और उन्हें आवाज़ दी जाएगी, "यहजन्नत है, जिसके तुम वारिस बनाए गए। उन कर्मों के बदले में जो तुम करते रहे थे।" (43)
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☆    जन्नतवाले आगवालों को पुकारेंगे, "हमसे हमारे रब ने जो वादा किया था, उसे हमने सच पाया। तो क्या तुमसे तुम्हारे रब ने जो वादा कर रखा था, तुमने भी उसे सच पाया?" वे कहेंगे, "हाँ।" इतनेमें एक पुकारनेवाला उनके बीच पुकारेगा, "अल्लाह की फिटकार है अत्याचारियों पर।" (44)
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☆    जो अल्लाह के मार्ग से रोकते और उसे टेढ़ा करना चाहते हैं और जो आख़िरत का इनकार करते हैं, (45)
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☆    और इन दोनों के मध्य एक ओट होगी। और ऊँचाइयों पर कुछ लोगहोंगे जो प्रत्येक को उसके लक्षणों से पहचानते होंगे, औरजन्नतवालों से पुकारकर कहेंगे, "तुम पर सलाम है।" वे अभी जन्नत में प्रविष्ट तो नहीं हुए होंगे, यद्यपि वे आस लगाए होंगे। (46)
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☆   और जब उनकी निगाहें आगवालों की ओर फिरेंगी, तो कहेंगे, "हमारे रब, हमें अत्याचारी लोगों में सम्मिलित न करना।" (47)
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☆    और ये ऊँचाइयोंवाले कुछ ऐसे लोगों से, जिन्हें ये उनके लक्षणों से पहचानते हैं,कहेंगे, "तुम्हारे जत्थे तो तुम्हारे कुछ काम न आए और न तुम्हारा अकड़ते रहना ही। (48)
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☆    "क्या ये वही हैं ना, जिनकेविषय में तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह उनपर अपनी दया-दृष्टि न करेगा।" जन्नत में प्रवेश करो, तुम्हारे लिएन कोई भय है और न तुम्हें कोई शोक होगा।" (49)
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☆    आगवाले जन्नतवालों को पुकारेंगे कि, "थोड़ा पानी हमपर बहा दो, या उन चीज़ों मेंसे कुछ दे दो जो अल्लाह ने तुम्हें दी हैं।" वे कहेंगे,"अल्लाह ने तो ये दोनों चीज़ेंइनकार करनेवालों के लिए वर्जित कर दी हैं।" (50)
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☆    उनके लिए जिन्होंने अपना धर्म खेल-तमाशा ठहराया और जिन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल दिया, तो आज हम भी उन्हें भुला देंगे, जिस प्रकार वे अपने इस दिन की मुलाक़ात को भूले रहे और हमारी आयतों का इनकार करते रहे। (51)
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☆   और निश्चय ही हम उनके पास एक ऐसी किताब ले आए हैं, जिसे हमने ज्ञान के आधार पर विस्तृत किया है, जो ईमान लानेवालों के लिए मार्गदर्शनऔर दयालुता है। (52)
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☆    क्या वे लोग केवल इसी की प्रतीक्षा में हैं कि उसकी वास्तविकता और परिणाम प्रकट हो जाए? जिस दिन उसकी वास्तविकता सामने आ जाएगी, तोवे लोग जो इससे पहले उसे भूले हुए थे, बोल उठेंगे, "वास्तव में, हमारे रब के रसूल सत्य लेकर आए थे। तो क्या हमारे कुछ सिफ़ारिशी हैं, जो हमारी सिफ़ारिश कर दें या हमें वापसभेज दिया जाए कि जो कुछ हम करते थे उससे भिन्न कर्म करें?" उन्होंने अपने आपको घाटे में डाल दिया और जो कुछ वे झूठ घढ़ते थे, वे सब उनसे गुम होकर रह गए।(53)
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☆    निस्संदेह तुम्हारा रब वही अल्लाह है, जिसने आकाशों और धरती को छह दिनों में पैदा किया - फिर राजसिंहासन पर विराजमान हुआ। वह रात को दिन पर ढाँकता है जो तेज़ी से उसका पीछा करने में सक्रिय है। और सूर्य, चन्द्रमा और तारे भी बनाए, इस प्रकार कि वेउसके आदेश से काम में लगे हुए हैं। सावधान रहो, उसी की सृष्टि है और उसी का आदेश है। अल्लाह सारे संसार का रब, बड़ी बरकतवाला है। (54)
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☆    अपने रब को गिड़गिड़ाकर औरचुपके-चुपके पुकारो। निश्चय ही वह हद से आगे बढ़नेवालों को पसन्द नहीं करता। (55)
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☆   और धरती में उसके सुधार के पश्चात बिगाड़ न पैदा करो। भयऔर आशा के साथ उसे पुकारो। निश्चय ही, अल्लाह की दयालुतासत्कर्मी लोगों के निकट है। (56)
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☆     और वही है जो अपनी दयालुता से पहले शुभ सूचना देने को हवाएँ भेजता है, यहाँ तक कि जबवे बोझल बादल को उठा लेती हैं तो हम उसे किसी निर्जीव भूमि की ओर चला देते हैं, फिर उससे पानी बरसाते हैं, फिर उससे हर तरह के फल निकालते हैं। इसी प्रकार हम मुर्दों को मृत अवस्था से निकालेंगे - ताकि तुम्हें ध्यान हो। (57)
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☆    और अच्छी भूमि के पेड़-पौधे उसके रब के आदेश से निकलते हैं और जो भूमि ख़राब हो गई है तो उससे निकम्मी पैदावार के अतिरिक्त कुछ नहीं निकलता। इसी प्रकार हम निशानियों को उन लोगों के लिएतरह-तरह से बयान करते हैं, जो कृतज्ञता दिखानेवाले हैं। (58)
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☆     हमने नूह को उसकी क़ौम के लोगों की ओर भेजा, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्यनहीं। मैं तुम्हारे लिए एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ।" (59)
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☆    उसकी क़ौम के सरदारों ने कहा, "हम तो तुम्हें खुली गुमराही में पड़ा देख रहे हैं।" (60)
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☆    उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! किसी गुमराही का मुझसे सम्बन्ध नहीं, बल्कि मैं सारेसंसार के रब का एक रसूल हूँ। (61)
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☆    अपने रब के सन्देश पहुँचाता हूँ और तुम्हारा हित चाहता हूँ, और मैं अल्लाह की ओर से वह कुछ जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते।" (62)
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☆    क्या (तुमने मुझे झूठा समझा) और तुम्हें इस पर आश्चर्य हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक आदमी के द्वारा तुम्हारे रब की नसीहत आई? ताकि वह तुम्हें सचेत कर दे और ताकि तुम डर रखने लगो औरशायद कि तुमपर दया की जाए। (63)
_______________________________
☆    किन्तु उन्होंने झुठला दिया। अन्ततः हमने उसे और उन लोगों को जो उसके साथ एक नौका में थे, बचा लिया और जिन लोगोंने हमारी आयतों को ग़लत समझा, उन्हें हमने डूबो दिया। निश्चय ही वे अन्धे लोग थे। (64)
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☆     और आद की ओर उनके भाई हूद को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो, उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तो क्या (इसे सोचकर) तुम डरते नहीं?" (65)
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☆    उसकी क़ौम के इनकार करनेवाले सरदारों ने कहा,"वास्तव में, हम तो देखते हैं कि तुम बुद्धिहीनता में ग्रस्त हो और हम तो तुम्हें झूठा समझते हैं।" (66)
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☆    उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं बुद्धिहीनता में कदापि ग्रस्त नहीं हूँ। परन्तु मैं सारे संसार के रब का रसूल हूँ। (67)
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☆    तुम्हें अपने रब के संदेश पहुँचाता हूँ और मैं तुम्हारा विश्वस्त हितैषी हूँ। (68)
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☆     क्या (तुमने मुझे झूठा समझा) और तुम्हें इसपर आश्चर्य हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक आदमी के द्वारा तुम्हारे रब की नसीहत आई, ताकि वह तुम्हें सचेत करे?और याद करो, जब उसने नूह की क़ौम के पश्चात तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया और शारीरिक दृष्टि से भी तुम्हें अधिक विशालता प्रदानकी। अतः अल्लाह की सामर्थ्य के चमत्कारों को याद करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो।" (69)
_______________________________
☆     वे बोले, "क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि अकेले अल्लाह की हम बन्दगी करें और जिनको हमारे बाप-दादा पूजते रहे हैं, उन्हें छोड़ दें? अच्छा, तो जिसकी तुम हमें धमकी देते हो, उसे हमपर ले आओ, यदि तुम सच्चे हो।" (70)
_______________________________
☆    उसने कहा, "तुम पर तो तुम्हारे रब की ओर से नापाकी थोप दी गई है और प्रकोप टूट पड़ा है। क्या तुम मुझसे उन नामों के लिए झगड़ते हो जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख छोड़े हैं, जिनके लिए अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा? अच्छा, तो तुम भी प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करताहूँ।" (71)
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☆    फिर हमने अपनी दयालुता से उसको और जो लोग उसके साथ थे उन्हें बचा लिया और उन लोगों की जड़ काट दी, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया था औरईमानवाले न थे। (72)
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☆    और समूद की ओर उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है। यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है। अतः इसे छोड़ दो कि अल्लाह की धरती में खाए। और तकलीफ़ पहुँचाने के लिए इसे हाथ न लगाना, अन्यथा तुम्हें एक दुखद यातना आ लेगी। (73)
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☆    और याद करो जब अल्लाह ने आदके पश्चात तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया और धरती में तुम्हें ठिकाना प्रदान किया। तुम उसके समतल मैदानों में महल बनाते हो और पहाड़ों को काट-छाँट कर भवनों का रूप देते हो। अतः अल्लाह की सामर्थ्य के चमत्कारों को याद करो और धरती में बिगाड़ पैदा करते न फिरो।" (74)
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☆    उसकी क़ौम के सरदार, जो बड़े बने हुए थे, उन कमज़ोर लोगों से, जो उनमें ईमान लाए थे, कहने लगे, "क्या तुम जानते हो कि सालेह अपने रब का भेजा हुआ (पैग़म्बर) है?" उन्होंने कहा, "निस्संदेह जिस चीज़ के साथ वह भेजा गया है, हम उसपर ईमान रखते हैं।" (75)
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☆    उन घमंड करनेवालों ने कहा,"जिस चीज़ पर तुम ईमान लाए हो, हम तो उसको नहीं मानते।" (76)
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☆    फिर उन्होंने उस ऊँटनी की कूचें काट दीं और अपने रब के आदेश की अवहेलना की और बोले,"ऐ सालेह! हमें तू जिस चीज़ की धमकी देता है, उसे हमपर ले आ, यदि तू वास्तव में रसूलों मेंसे है।" (77)
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☆    अन्ततः एक हिला मारनेवाली आपदा ने उन्हें आ लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए। (78)
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☆    फिर वह यह कहता हुआ उनके यहाँ से फिरा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं तो तुम्हें अपने रब का संदेश पहुँचा चुका और मैंने तुम्हारा हित चाहा। परन्तु तुम्हें अपने हितैषी पसन्द ही नहीं आते।" (79)
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☆    और हमने लूत को भेजा। जब उसने अपनी क़ौम से कहा, "क्या तुम वह प्रत्यक्ष अश्लील कर्म करते हो, जिसे दुनिया में तुमसे पहले किसी ने नहीं किया?" (80)
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☆    तुम स्त्रियों को छोड़कर मर्दों से कामेच्छा पूरी करते हो, बल्कि तुम नितान्त मर्यादाहीन लोग हो। (81)
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☆    उसकी क़ौम के लोगों का उत्तर इसके अतिरिक्त और कुछ नथा कि वे बोले, "निकालो, उन लोगों को अपनी बस्ती से। ये ऐसे लोग हैं जो बड़े पाक-साफ़ हैं!" (82)
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☆    फिर हमने उसे और उसके लोगों को छुटकारा दिया, सिवायउसकी स्त्री के कि वह पीछे रह जानेवालों में से थी। (83)
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☆    और हमने उनपर एक बरसात बरसाई, तो देखो अपराधियों का कैसा परिणाम हुआ। (84)
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☆    और मदयनवालों की ओर हमने उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्यनहीं। तुम्हारे पास तुम्हारेरब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है। तो तुम नाप और तौल पूरी-पूरी करो, और लोगों को उनकी चीज़ों में घाटा न दो, औरधरती में उसके सुधार के पश्चात बिगाड़ पैदा न करो। यही तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम ईमानवाले हो। (85)
_______________________________
☆   और प्रत्येक मार्ग पर इसलिए न बैठो कि धमकियाँ दो और उस व्यक्ति को अल्लाह के मार्ग से रोकने लगो जो उसपर ईमान रखता हो और न उस मार्ग कोटेढ़ा करने में लग जाओ। याद करो, वह समय जब तुम थोड़े थे, फिर उसने तुम्हें अधिक कर दिया। और देखो, बिगाड़ पैदा करनेवालों का कैसा परिणाम हुआ। (86)
_______________________________
☆    और यदि तुममें एक गरोह ऐसा है, जो उसपर ईमान लाया है, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ और एक गरोह ईमान नहीं लाया, तोधैर्य से काम लो, यहाँ तक कि अल्लाह हमारे बीच फ़ैसला कर दे। और वह सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।" (87)
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☆   उसकी क़ौम के सरदारों ने, जो घमंड में पड़े थे, कहा, "ऐ शुऐब! हम तुझे और तेरे साथ उन लोगों को, जो ईमान लाए हैं, अपनी बस्ती से निकालकर रहेंगे। या फिर तुम हमारे पन्थ में लौट आओ।" उसने कहा,"क्या (तुम यही चाहोगे) यद्यपि यह हमें अप्रिय हो जब भी?(88)
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☆    हम अल्लाह पर झूठ घड़नेवाले ठहरेंगे, यदि तुम्हारे पन्थ में लौट आएँ, इसके बाद कि अल्लाह ने हमें उससे छुटकारा दे दिया है। यह हमसे तो होने का नहीं कि हम उसमें पलट कर जाएँ, बल्कि हमारे रब अल्लाह की इच्छा ही क्रियान्वित है। ज्ञान की दृष्टि से हमारा रब हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है। हमने अल्लाह ही पर भरोसा कियाहै। हमारे रब, हमारे और हमारी क़ौम के बीच निश्चित अटल फ़ैसला कर दे। और तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है। (89)
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☆    उसकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, बोले, "यदि तुम शुऐब के अनुयायी बने तो तुम घाटे में पड़ जाओगे।" (90)
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☆    अन्ततः एक दहला देनेवाली आपदा ने उन्हें आ लिया। फिर वे अपने घर में औंधे पड़े रह गए, (91)
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☆    शुऐब को झुठलानेवाले, मानोकभी वहाँ बसे ही न थे। शुऐब कोझुठलानेवाले ही घाटे में रहे। (92)
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☆    तब वह उनके यहाँ से यह कहताहुआ फिरा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के सन्देश तुम्हें पहुँचा दिए और मैंने तुम्हारा हित चाहा। अब मैं इनकार करनेवाले लोगों पर कैसे अफ़सोस करूँ!" (93)
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☆   हमने जिस बस्ती में भी कभी कोई नबी भेजा, तो वहाँ के लोगों को तंगी और मुसीबत में डाला, ताकि वे (हमारे सामने) गिड़गि़ड़ाएँ। (94)
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☆  फिर हमने बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे ख़ूब फले-फूले और कहने लगे, "ये दुख और सुख तो हमारे बाप-दादा को भी पहुँचे हैं।" अन्ततः जब वे बेख़बर थे, हमने अचानक उन्हें पकड़ लिया। (95)
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☆    यदि बस्तियों के लोग ईमान लाते और डर रखते तो अवश्य ही हम उनपर आकाश और धरती की बरकतें खोल देते, परन्तु उन्होंने तो झुठलाया। तो जो कुछ कमाई वे करते थे, उसके बदले में हमने उन्हें पकड़ लिया। (96)
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☆    फिर क्या बस्तियों के लोगों को इस ओर से निश्चिन्त रहने का अवसर मिल सका कि रात में उनपर हमारी यातना आ जाए, जबकि वे सोए हुए हों? (97)
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☆    और क्या बस्तियों के लोगोंको
इस ओर से निश्चिन्त रहने का अवसर मिलaqq सका कि दिन चढ़े उनपर हमारी यातना आ जाए, जबकि वे खेल रहे हों? (98) _______________________________
☆    आख़िर क्या वे अल्लाह की चाल से निश्चिन्त हो गए थे? तो(समझ लो उन्हें टोटे में पड़ना ही था, क्योंकि) अल्लाह की चाल से तो वही लोग निश्चिन्त होते हैं, जो टोटे में पड़नेवाले होते हैं। (99)
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☆   क्या जो धरती के, उसके पूर्ववासियों के पश्चात उत्तराधिकारी हुए हैं, उनपर यह तथ्य प्रकट न हुआ कि यदि हमचाहें तो उनके गुनाहों पर उन्हें आ पकड़ें? हम तो उनके दिलों पर मुहर लगा रहे हैं, क्योंकि वे कुछ भी नहीं सुनते। (100)
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☆      ये हैं वे बस्तियाँ जिनके कुछ वृत्तान्त हम तुमको सुना रहे हैं । उनके पास उनके रसूल खुली-खुली निशानियाँ लेकर आए परन्तु वे ऐसे न हुए कि ईमान लाते। इसका कारण यह था कि वे पहले से झुठलाते रहे थे। इसी प्रकार अल्लाह इनकार करनेवालों के दिलों पर मुहर लगा देता है। (101)
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☆   हमने उनके अधिकतर लोगों में प्रतिज्ञा का निर्वाह न पाया, बल्कि उनके बहुतों को हमने उल्लंघनकारी ही पाया। (102)
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☆    फिर उनके पश्चात हमने मूसाको अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा, परन्तु उन्होंने उनका इनकार और स्वयं पर अत्याचार किया। तो देखो, इन बिगाड़ पैदा करनेवालों का कैसा परिणाम हुआ! (103)
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☆    मूसा ने कहा, "ऐ फ़िरऔन! मैं सारे संसार के रब का रसूल हूँ। (104)
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☆  मैं इसका अधिकारी हूँ कि अल्लाह से सम्बद्ध करके सत्य के अतिरिक्त कोई बात न कहूँ। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से स्पष्ट प्रमाण लेकर आ गया हूँ। अतः तुम इसराईल की सन्तान को मेरे साथजाने दो।"(105)
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☆    बोला, "यदि तुम कोई निशानी लेकर आए हो तो उसे पेश करो, यदि तुम सच्चे हो।" (106)
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☆    तब उसने अपनी लाठी डाल दी। क्या देखते हैं कि वह प्रत्यक्ष अजगर है। (107)
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☆    और उसने अपना हाथ निकाला, तो क्या देखते हैं कि वह सब देखनेवालों के सामने चमक रहा है। (108)
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☆    फ़िरऔन की क़ौम के सरदार कहने लगे, "अरे, यह तो बड़ा कुशलजादूगर है! (109)
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☆    तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल देना चाहता है। तो अब क्या कहते हो?" (110)
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☆   उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को प्रतीक्षा में रखो और नगरों में हरकारे भेज दो, (111)
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☆    कि वे हर कुशल जादूगर को तुम्हारे पास ले आएँ।" (112)
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☆    अतएव जादूगर फ़िरऔन के पासआ गए। कहने लगे, "यदि हम विजयी हुए तो अवश्य ही हमें बड़ा बदला मिलेगा?" (113)
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☆    उसने कहा, "हाँ, और बेशक तुम (मेरे) क़रीबियों में से हो जाओगे।" (114)
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☆    उन्होंने कहा, "ऐ मूसा! या तुम डालो या फिर हम डालते हैं?" (115)
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☆   उसने कहा, "तुम ही डालो।" फिर उन्होंने डाला तो लोगों की आँखों पर जादू कर दिया और उन्हें भयभीत कर दिया। उन्होंने एक बहुत बड़े जादू का प्रदर्शन किया। (116)
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☆    हमने मूसा की ओर प्रकाशना की कि "अपनी लाठी डाल दे।" फिरक्या देखते हैं कि वह उनके रचे हुए स्वांग को निगलती जा रही है। (117)
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☆   इस प्रकार सत्य प्रकट हो गया और जो कुछ वे कर रहे थे, मिथ्या होकर रहा। (118)
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☆    अतः वे पराभूत हो गए और अपमानित होकर रहे। (119)
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☆    और जादूगर सहसा सजदे में गिर पड़े। (120)
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☆    बोले, "हम सारे संसार के रबपर ईमान ले आए; (121)
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☆    मूसा और हारून के रब पर।" (122)
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☆    फ़िरऔन बोला, "इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति दूँ, तुम उसपर ईमान ले आए! यह तो एक चाल है, जो तुम लोग नगर में चले हो, ताकि उसके निवासियों को उससे निकाल दो। अच्छा, तो अब तुम्हें जल्द ही मालूम हुआजाता है! (123)
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☆    मैं तुम्हारे हाथ और तुम्हारे पाँव विपरीत दिशाओंसे काट दूँगा; फिर तुम सबको सूली पर चढ़ाकर रहूँगा।" (124)
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☆ उन्होंने कहा, "हम तो अपने रब ही की ओर लौटेंगे। (125)
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☆   और तू केवल इस क्रोध से हमें कष्ट पहुँचाने के लिए पीछे पड़ गया है कि हम अपने रबकी निशानियों पर ईमान ले आए। हमारे रब! हमपर धैर्य उड़ेल दे और हमें इस दशा में उठा कि हम मुस्लिम (आज्ञाकारी) हों।" (126)
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☆   फ़िरऔन की क़ौम के सरदार कहने लगे, "क्या तुम मूसा और उसकी क़ौम को ऐसे ही छोड़ दोगे कि वे ज़मीन में बिगाड़ पैदा करें और वे तुम्हें और तुम्हारे उपास्यों को छोड़ बैठें?" उसने कहा, "हम उनके बेटों को बुरी तरह क़त्ल करेंगे और उनकी स्त्रियों को जीवित रखेंगे। निश्चय ही हमें उनपर पूर्ण अधिकार प्राप्त है।"(127)
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☆     मूसा ने अपनी क़ौम से कहा,"अल्लाह से सम्बद्ध होकर सहायता प्राप्त करो और धैर्य से काम लो। धरती अल्लाह की है। वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसका वारिस बना देता है। और अंतिम परिणामतो डर रखनेवालों ही के लिए है।" (128)
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☆    उन्होंने कहा, "तुम्हारे आने से पहले भी हम सताए गए और तुम्हारे आने के बाद भी।" उसने कहा, "निकट है कि तुम्हारा रब तुम्हारे शत्रुओं को विनष्ट कर दे और तुम्हें धरती में ख़लीफ़ा बनाए, फिर यह देखे कि तुम कैसेकर्म करते हो।" (129)
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☆   और हमने फ़िरऔनियों को कई वर्ष तक अकाल और पैदावार की कमी में ग्रस्त रखा कि वे चेतें। (130)
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☆     फिर जब उन्हें अच्छी हालत पेश आती है तो कहते हैं, "यह तोहै ही हमारे लिए।" और जब उन्हें बुरी हालत पेश आए तो वे उसे मूसा और उसके साथियों की नहूसत (अशकुन) ठहराएँ। सुन लो, उनकी नहूसत तो अल्लाह ही के पास है, परन्तु उनमें से अधिकतर लोग जानते नहीं। (131)
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☆   वे बोले, "तू हमपर जादू करने के लिए चाहे कोई भी निशानी हमारे पास ले आए, हम तुझपर ईमान लानेवाले नहीं।" (132)
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☆    अन्ततः हमने उनपर तूफ़ान और टिड्डियाँ और छोटे कीड़े और मेंढक और रक्त, कितनी ही निशानियाँ अलग-अलग भेजीं, किन्तु वे घमंड ही करते रहे। वे थे ही अपराधी लोग। (133)
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☆    जब कभी उनपर यातना आ पड़ती,कहते थे, "ऐ मूसा, हमारे लिए अपने रब से प्रार्थना करो, उस प्रतिज्ञा के आधार पर जो उसनेतुमसे कर रखी है। तुमने यदि हमपर से यह यातना हटा दी, तो हम अवश्य ही तुमपर ईमान ले आएँगे और इसराईल की सन्तान कोतुम्हारे साथ जाने देंगे।" (134)
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☆   किन्तु जब हम उनपर से यातना को एक नियत समय के लिए जिस तक वे पहुँचनेवाले ही थे, हटा लेते तो क्या देखते कि वे वचन-भंग करने लग गए। (135)
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☆    फिर हमने उनसे बदला लिया और उन्हें गहरे पानी में डूबोदिया, क्योंकि उन्होंने हमारी निशानियों को ग़लत समझा और उनसे ग़ाफिल हो गए। (136)
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☆    और जो लोग कमज़ोर पाए जाते थे, उन्हें हमने उस भू-भाग के पूरब के हिस्सों और पश्चिम केहिस्सों का उत्तराधिकारी बनादिया, जिसे हमने बरकत दी थी। और तुम्हारे रब का अच्छा वादाइसराईल की सन्तान के हक़ में पूरा हुआ, क्योंकि उन्होंने धैर्य से काम लिया और फ़िरऔन और उसकी क़ौम का वह सब कुछ हमने विनष्ट कर दिया, जिसे वे बनाते और ऊँचा उठाते थे। (137)
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☆  और इसराईल की सन्तान को हमने सागर से पार करा दिया, फिर वे ऐसे लोगों के पास पहुँचे जो अपनी कुछ मूर्तियों से लगे बैठे थे। कहने लगे, "ऐ मूसा! हमारे लिए भी कोई ऐसा उपास्य ठहरा दे, जैसे इनके उपास्य हैं।" उसने कहा, "निश्चय ही तुम बड़े ही अज्ञानी लोग हो। (138)
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☆   “निश्चय ही वह सब कुछ जिसमें ये लोग लगे हुए हैं, बरबाद होकर रहेगा। और जो कुछ ये कर रहे हैं सर्वथा व्यर्थ है।" (139)
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☆   उसने कहा, "क्या मैं अल्लाह के सिवा तुम्हारे लिए कोई और उपास्य ढूढूँ, हालाँकिउसी ने सारे संसारवालों पर तुम्हें श्रेष्ठता प्रदान की?" (140)
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☆    और याद करो जब हमने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से छुटकारा दिया जो तुम्हें बुरी यातना में ग्रस्त रखते थे। तुम्हारे बेटों को मार डालते और तुम्हारी स्त्रियोंको जीवित रहने देते थे। और वह (छुटकारा दिलाना) तुम्हारे रबकी ओर से बड़ा अनुग्रह है। (141)
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☆     और हमने मूसा से तीस रातों का वादा ठहराया, फिर हमने दस और बढ़ाकर उसे पूरा किया। इसीप्रकार उसके रब की ठहराई हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई और मूसा ने अपने भाई हारून से कहा, "मेरे पीछे तुम मेरी क़ौम में मेरा प्रतिनिधित्व करना और सुधारना -सँवारना और बिगाड़ पैदा करनेवालों के मार्ग पर नचलना।" (142)
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☆   जब मूसा हमारे निश्चित किए हुए समय पर पहुँचा और उसके रब ने उससे बातें की, तो वह कहने लगा, "मेरे रब! मुझे देखने की शक्ति प्रदान कर कि मैं तुझे देखूँ।" कहा, "तू मुझे कदापि नदेख सकेगा। हाँ, पहाड़ की ओर देख। यदि वह अपने स्थान पर स्थिर रह जाए तो फिर तू मुझे देख लेगा।" अतएव जब उसका रब पहाड़ पर प्रकट हुआ तो उसे चकनाचूर कर दिया और मूसा मूर्छित होकर गिर पड़ा। फिर जब होश में आया तो कहा, "महिमा है तेरी! मैं तेरे समक्ष तौबा करता हूँ और सबसे पहला ईमान लानेवाला मैं हूँ।"(143)
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☆   उसने कहा, "ऐ मूसा! मैंने दूसरे लोगों के मुक़ाबले में तुझे चुनकर अपने संदेशों और अपनी वाणी से तुझे उपकृत किया। अतः जो कुछ मैं तुझे दूँ उसे ले और कृतज्ञता दिखा।" (144)
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☆    और हमने उसके लिए तख़्तियों पर उपदेश के रूप में हर चीज़ का विस्तृत वर्णनलिख दिया। अतः उनको मज़बूती से पकड़। उनमें उत्तम बातें हैं। अपनी क़ौम के लोगों को हुक्म दे कि वे उनको अपनाएँ। मैं शीघ्र ही तुम्हें अवज्ञाकारियों का घर दिखाऊँगा। (145)
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☆   जो लोग धरती में नाहक़ बड़ेबनते हैं, मैं अपनी निशानियोंकी ओर से उन्हें फेर दूँगा। यदि वे प्रत्येक निशानी देख लें तब भी वे उस पर ईमान नहीं लाएँगे। यदि वे सीधा मार्ग देख लें तो भी वे उसे अपना मार्ग नहीं बनाएँगे। लेकिन यदि वे पथभ्रष्ट का मार्ग देखलें तो उसे अपना मार्ग ठहरा लेंगे। यह इसलिए की उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे ग़ाफ़िल रहे।(146)
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☆    जिन लोगों ने हमारी आयतों को और आख़िरत के मिलन को झूठा जाना, उनका तो सारा किया-धरा उनकी जान को लागू हुआ। जो कुछ वे करते रहे क्या उसके सिवा वे किसी और चीज़ का बदला पाएँगे? (147)
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☆   और मूसा के पीछे उसकी क़ौम ने अपने ज़ेवरों से अपने लिए एक बछड़ा बना लिया, जिसमें से बैल की-सी आवाज़ निकलती थी। क्या उन्होंने देखा नहीं कि वह न तो उनसे बातें करता है औरन उन्हें कोई राह दिखाता है? उन्होंने उसे अपना उपास्य बना लिया, औऱ वे बड़े अत्याचारी थे।(148)
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☆    और जब (चेतावनी से) उन्हें पश्चाताप हुआ और उन्होंने देख लिया कि वास्तव में वे भटक गए हैं तो कहने लगे, "यदि हमारे रब ने हमपर दया न की और उसने हमें क्षमा न किया तो हम घाटे में पड़ जाएँगे!" (149)
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☆   और जब मूसा क्रोध और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम की ओर लौटा तो उसने कहा, "तुम लोगों ने मेरे पीछे मेरी जगह बुरा किया। क्या तुम अपने रब के हुक्म से पहले ही जल्दी कर बैठे?" फिर उसने तख़्तियाँ डाल दीं और अपने भाई का सिर पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। वह बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! लोगों ने मुझे कमज़ोर समझ लिया और निकट था कि मुझे मार डालते। अतः शत्रुओं को मुझपर हुलसने का अवसर न दे और अत्याचारी लोगों में मुझे सम्मिलित न कर।"(150)
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☆   उसने कहा, "मेरे रब! मुझे औरमेरे भाई को क्षमा कर दे और हमें अपनी दयालुता में दाख़िल कर ले। तू तो सबसे बढ़कर दयावान है।"(151)
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☆   जिन लोगों ने बछड़े को अपना उपास्य बनाया, वे अपने रब की ओर से प्रकोप और सांसारिक जीवन में अपमान में ग्रस्त होकर रहेंगे; और झूठ घड़नेवालों को हम ऐसा ही बदलादेते हैं। (152)
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☆    रहे वे लोग जिन्होंने बुरेकर्म किए फिर उसके पश्चात तौबा कर ली और ईमान ले आए, तो इसके बाद तो तुम्हारा रब बड़ाही क्षमाशील, दयावान है। (153)
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☆  और जब मूसा का क्रोध शान्त हुआ तो उसने तख़्तियों को उठालिया। उनके लेख में उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता थी जो अपने रब से डरते हैं। (154)
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☆   मूसा ने अपनी क़ौम के सत्तरआदमियों को हमारे नियत किए हुए समय के लिए चुना। फिर जब उन लोगों को एक भूकम्प ने आ पकड़ा तो उसने कहा, "मेर रब! यदि तू चाहता तो पहले ही इनको और मुझको विनष्ट कर देता। जो कुछ हमारे नादानों ने किया है, क्या उसके कारण तू हमें विनष्ट करेगा? यह तो बस तेरी ओर से एक परीक्षा है। इसके द्वारा तू जिसको चाहे पथभ्रष्ट कर दे और जिसे चाहे मार्ग दिखा दे। तू ही हमारा संरक्षक है। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर, और तू ही सबसे बढ़कर क्षमा करनेवाला है।(155)
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☆    और हमारे लिए इस संसार में भलाई लिख दे और आख़िरत में भी। हम तेरी ही ओर उन्मुख हुए।" उसने कहा, "अपनी यातना में मैं तो उसी को ग्रस्त करता हूँ, जिसे चाहता हूँ, किन्तु मेरी दयालुता से हर चीज़ आच्छादित है। उसे तो मैंउन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो डर रखते हैं और ज़कात देते हैं और जो हमारी आयतों पर ईमान लाते हैं। (156)
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☆   (तो आज इस दयालुता के अधिकारी वे लोग हैं) जो उस रसूल, उम्मी नबी का अनुसरण करते हैं, जिसे वे अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा पातेहैं। और जो उन्हें भलाई का हुक्म देता और बुराई से रोकताहै। उनके लिए अच्छी-स्वच्छ चीज़ों को हलाल और बुरी-अस्वच्छ चीज़ों को हराम ठहराता है और उनपर से उनके वह बोझ उतारता है, जो अब तक उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः जो लोग उसपर ईमान लाए, उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उस प्रकाश के अनुगत हुए, जो उसके साथ अवतरित हुआ है, वही सफलता प्राप्त करनेवाले हैं।"(157)
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☆   कहो, "ऐ लोगो! मैं तुम सबकी ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जो आकाशों और धरती के राज्य का स्वामी है उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वही जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है। अतः अल्लाह और उसके रसूल, उस उम्मी नबी, पर ईमान लाओ जो स्वयं अल्लाह पर और उसके शब्दों (वाणी) पर ईमान रखता हैऔर उनका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्ग पा लो।" (158)
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☆   मूसा की क़ौम में से एक गरोह ऐसे लोगों का भी हुआ जो हक़ के अनुसार मार्ग दिखाते और उसी के अनुसार न्याय करते।(159)
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☆   और हमने उन्हें बारह ख़ानदानों में विभक्त करके अलग-अलग समुदाय बना दिया। जब उसकी क़ौम के लोगों ने पानी माँगा तो हमने मूसा की ओर प्रकाशना की, "अपनी लाठी अमुक चट्टान पर मारो।" अतएव उससे बारह स्रोत फूट निकले और हर गरोह ने अपना-अपना घाट मालूम कर लिया। और हमने उनपर बादल की छाया की और उन पर 'मन्न' और 'सलवा' उतारा, "हमनें तुम्हें जो अच्छी-स्वच्छ चीज़ें प्रदान की हैं, उन्हें खाओ।" उन्होंने हम पर कोई ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि वास्तव में वे स्वयं अपने ऊपर ही ज़ुल्म करते रहे।(160)
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☆    याद करो जब उनसे कहा गया,"इस बस्ती में रहो-बसो और इसमें जहाँ से चाहो खाओ और कहो - हित्ततुन। और द्वार में सजदा करते हुए प्रवेश करो। हमतुम्हारी ख़ताओं को क्षमा कर देंगे और हम सुकर्मी लोगों कोऔर अधिक भी देंगे।" (161)
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☆    किन्तु उनमें से जो अत्याचारी थे उन्होंने, जो कुछ उनसे कहा गया था, उसको उससे भिन्न बात से बदल दिया। अतः जो अत्याचार वे कर रहे थे,उसके कारण हमने आकाश से उनपर यातना भेजी। (162)
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☆    उनसे उस बस्ती के विषय में पूछो जो सागर-तट पर थी। जब वे सब्त के मामले में सीमा का उल्लंघन करते थे, जब उनके सब्त के दिन उनकी मछलियाँ खुले तौर पर पानी के ऊपर आ जाती थीं और जो दिन उनके सब्त का न होता तो वे उनके पास न आती थीं। इस प्रकार उनके अवज्ञाकारी होने के कारण हम उनको परीक्षा में डाल रहे थे।(163)
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☆    और जब उनके एक गरोह ने कहा,"तुम ऐसे लोगों को क्यों नसीहत किए जा रहे हो, जिन्हें अल्लाह विनष्ट करनेवाला है या जिन्हें वह कठोर यातना देनेवाला है?" उन्होंने कहा,"तुम्हारे रब के समक्ष अपने कोनिरपराध सिद्ध करने के लिए, और कदाचित वे (अवज्ञा से) बचें।" (164)
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☆    फिर जब वे उसे भूल गए जो नसीहत उन्हें की गई थी तो हमने उन लोगों को बचा लिया, जोबुराई से रोकते थे और अत्याचारियों को उनकी अवज्ञाके कारण कठोर यातना में पकड़ लिया। (165)
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☆   फिर जब वे सरकशी के साथ वही कुछ करते रहे, जिससे उन्हें रोका गया था तो हमने उनसे कहा,"बन्दर हो जाओ, अपमानित और तिरस्कृत!" (166)
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☆    और याद करो जब तुम्हारे रब ने ख़बर कर दी थी कि वह क़ियामत के दिन तक उनके विरुद्ध ऐसे लोगों को उठाता रहेगा, जो उन्हें बुरी यातना देंगे। निश्चय ही तुम्हारा रब जल्द सज़ा देता है और वह बड़ा क्षमाशील, दयावान भी है।(167)
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☆  और हमने उन्हें टुकड़े-टुकड़े करके धरती में अनेक गिरोहों में बिखेर दिया। कुछ उनमें से नेक हैं और कुछ उनमें इससे भिन्न हैं, और हमने उन्हें अच्छी और बुरी परिस्थितियों में डालकर उनकीपरीक्षा ली, कदाचित वे पलट आएँ।(168)
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☆   फिर उनके पीछे ऐसे अयोग्य लोगों ने उनकी जगह ली, जो किताब के उत्ताराधिकारी होकरइसी तुच्छ संसार का सामान समेटते हैं और कहते हैं, "हमेंअवश्य क्षमा कर दिया जाएगा।" और यदि इस जैसा और सामान भी उनके पास आ जाए तो वे उसे भी ले लेंगे। क्या उनसे किताब कायह वचन नहीं लिया गया था कि वेअल्लाह पर थोपकर हक़ के सिवा कोई और बात न कहें। और जो उसमें है उसे वे स्वयं पढ़ भी चुके हैं। और आख़िरत का घर तो उन लोगों के लिए उत्तम है, जो डर रखते हैं। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?(169)
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☆  और जो लोग किताब को मज़बूती से थामते हैं और जिन्होंने नमाज़ क़ायम कर रखी है, तो काम को ठीक रखनेवालों के प्रतिदान को हम कभी अकारथ नहीं करते। (170)
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☆    और याद करो जब हमने पर्वत को हिलाया, जो उनके ऊपर था। मानो वह कोई छत्र हो और वे समझे कि बस वह उनपर गिरा ही चाहता है, "थामो मज़बूती से, जो कुछ हमने दिया है। और जो कुछ उसमें है उसे याद रखो, ताकि तुम बच सको।" (171)
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☆    और याद करो जब तुम्हारे रब ने आदम की सन्तान से (अर्थात उनकी पीठों से) उनकी सन्तति निकाली और उन्हें स्वयं उनके ऊपर गवाह बनाया कि "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" बोले,"क्यों नहीं, हम गवाह हैं।" ऐसा इसलिए किया कि तुम क़ियामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि "हमें तो इसकी ख़बर ही न थी।" (172)
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☆    या कहो कि "(अल्लाह के साथ) साझी तो पहले हमारे बाप-दादा ने किया। हम तो उसके पश्चात उनकी सन्तति में हुए हैं। तो क्या तू हमें उसपर विनष्ट करेगा जो कुछ मिथ्याचारियों ने किया है?" (173)
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☆    इस प्रकार स्थिति के अनुकूल आयतें प्रस्तुत करते हैं। और शायद कि वे पलट आएँ। (174)
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☆   और उन्हें उस व्यक्ति का हाल सुनाओ जिसे हमने अपनी आयतें प्रदान कीं किन्तु वह उनसे निकल भागा। फिर शैतान नेउसे अपने पीछे लगा लिया। अन्ततः वह पथभ्रष्ट और विनष्ट होकर रहा।(175)
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☆    यदि हम चाहते तो इन आयतों के द्वारा उसे उच्चता प्रदान करते, किन्तु वह तो धरती के साथ लग गया और अपनी इच्छा के पीछे चला। अतः उसकी मिसाल कुत्ते जैसी है कि यदि तुम उसपर आक्षेप करो तब भी वह ज़बान लटकाए रहे या यदि तुम उसे छोड़ दो तब भी वह ज़बान लटकाए ही रहे। यही मिसाल उन लोगों की है, जिन्होंने हमारीआयतों को झुठलाया, तो तुम वृत्तान्त सुनाते रहो, कदाचित वे सोच-विचार कर सकें।(176)
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☆   बुरे हैं मिसाल की दृष्टि से वे लोग, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और वे स्वयंअपने ही ऊपर अत्याचार करते रहे। (177)
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☆    जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए वही सीधा मार्ग पानेवाला है और जिसे वह मार्ग से वंचित रखे, तो ऐसे ही लोग घाटे में पड़नेवाले हैं। (178)
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☆   निश्चय ही हमने बहुत-से जिन्नों और मनुष्यों को जहन्नम ही के लिए फैला रखा है। उनके पास दिल हैं जिनसे वे समझते नहीं, उनके पास आँखें हैं जिनसे वे देखते नहीं; उनके पास कान हैं जिनसे वे सुनते नहीं। वे पशुओं की तरह हैं, बल्कि वे उनसे भी अधिक पथभ्रष्ट हैं। वही लोग हैं जो ग़फ़लत में पड़े हुए हैं। (179)
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☆    अच्छे नाम अल्लाह ही के हैं। तो तुम उन्हीं के द्वाराउसे पुकारो और उन लोगों को छोड़ो जो उसके नामों के सम्बन्ध में कुटिलता ग्रहण करते हैं। जो कुछ वे करते हैं,उसका बदला वे पाकर रहेंगे। (180)
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☆   हमारे पैदा किए प्राणियों में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हक़के अनुसार मार्ग दिखाते और उसी के अनुसार न्याय करते हैं। (181)
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☆     रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, हम उन्हें क्रमशः तबाही की ओर लेजाएँगे, ऐसे तरीक़े से जिसे वे जानते नहीं। (182)
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☆   मैं तो उन्हें ढील दिए जा रहा हूँ। निश्चय ही मेरी चाल अत्यन्त सुदृढ़ है। (183)
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☆     क्या उन लोगों ने विचार नहीं किया? उनके साथी को कोई उन्माद नहीं। वह तो बस एक साफ़-साफ़ सचेत करनेवाला है। (184)
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☆    या क्या उन्होंने आकाशों और धरती के राज्य पर और जो चीज़ भी अल्लाह ने पैदा की है उसपर दृष्टि नहीं डाली, और इस बात पर कि कदाचित उनकी अवधि निकट आ लगी हो? फिर आख़िर इसकेबाद अब कौन-सी बात हो सकती है, जिसपर वे ईमान लाएँगे? (185)
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☆    जिसे अल्लाह मार्ग से वंचित रखे उसके लिए कोई मार्गदर्शक नहीं। वह तो उन्हें उनकी सरकशी ही में भटकता हुआ छोड़ रहा है। (186)
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☆    तुमसे उस घड़ी (क़ियामत) केविषय में पूछते हैं कि वह कब आएगी? कह दो, "उसका ज्ञान मेरेरब ही के पास है। अतः वही उसे उसके समय पर प्रकट करेगा। वह आकाशों और धरती में बोझिल हो गई है - बस अचानक ही वह तुमपर आजाएगी।" वे तुमसे पूछते हैं मानो तुम उसके विषय में भली-भाँति जानते हो। कह दो,"उसका ज्ञान तो बस अल्लाह ही के पास है - किन्तु अधिकांश लोग नहीं जानते।" (187)
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☆    कहो, "मैं अपने लिए न तो लाभ का अधिकार रखता हूँ और न हानि का,बल्कि अल्लाह ही की इच्छा क्रियान्वित है। यदि मुझे परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान होता तो बहुत-सी भलाई समेट लेता और मुझे कभी कोई हानि न पहुँचती। मैं तो बस सचेत करनेवाला और शुभ-समाचार देने वाला हूँ, उन लोगों के लिए जो ईमान लाएँ।" (188)
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☆   वही है जिसने तुम्हें अकेली जान पैदा किया और उसी की जाति से उसका जोड़ा बनाया, ताकि उसकी ओर प्रवृत्त होकर शान्ति और चैन प्राप्त करे। फिर जब उसने उसको ढाँक लिया तो उसने एक हल्का-सा बोझ उठा लिया; फिर वह उसे लिए हुए चलती-फिरती रही, फिर जब वह बोझिल हो गई तो दोनों ने अल्लाह - अपने रब को पुकारा,"यदि तूने हमें भला-चंगा बच्चा दिया, तो निश्चय ही हम तेरे कृतज्ञ होंगे।" (189)
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☆    किन्तु उसने जब उन्हें भला-चंगा (बच्चा) प्रदान किया तो जो उन्हें प्रदान किया उसमें वे दोनों उसका (अल्लाह का) साझी ठहराने लगे। किन्तु अल्लाह तो उच्च है उससे, जो साझी वे ठहराते हैं। (190)
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☆   क्या वे उसको साझी ठहराते हैं जो कोई चीज़ भी पैदा नहीं करता, बल्कि ऐसे उनके ठहराए हुए साझीदार तो स्वयं पैदा किए जाते हैं (191)
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☆   और वे न तो उनकी सहायता करने की सामर्थ्य रखते हैं औरन स्वयं अपनी ही सहायता कर सकते हैं? (192)
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☆   यदि तुम उन्हें सीधे मार्गकी ओर बुलाओ तो वे तुम्हारे पीछे न आएँगे। तुम्हारे लिए बराबर है - उन्हें पुकारो या तुम चुप रहो। (193)
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☆   तुम अल्लाह को छोड़कर जिन्हें पुकारते हो वे तो तुम्हारे ही जैसे बन्दे हैं, अतः पुकार लो उनको, यदि तुम सच्चे हो, तो उन्हें चाहिए कि वे तुम्हें उत्तर दें! (194)
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☆   क्या उनके पाँव हैं जिनसे वे चलते हों या उनके हाथ हैं जिनसे वे पकड़ते हों या उनके पास आँखें हैं जिनसे वे देखतेहों या उनके कान हैं जिनसे वे सुनते हों? कहो, "तुम अपने ठहराए हुए सहभागियों को बुला लो, फिर मेरे विरुद्ध चालें चलो, इस प्रकार कि मुझे मुहलत न दो।(195)
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☆    निश्चय ही मेरा संरक्षक मित्र अल्लाह है, जिसने यह किताब उतारी और वह अच्छे लोगों का संरक्षण करता है। (196)
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☆     रहे वे जिन्हें तुम उसको छोड़कर पुकारते हो, वे न तो तुम्हारी, सहायता करने की सामर्थ्य रखते हैं और न स्वयंअपनी ही सहायता कर सकते हैं। (197)
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☆    और यदि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ तो वे न सुनेंगे। वे तुम्हें ऐसे दीख पड़ते हैं जैसे वे तुम्हारी ओर ताक रहे हैं, हालाँकि वे कुछ भी नहीं देखते। (198)
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☆   क्षमा की नीति अपनाओ और भलाई का हुक्म देते रहो और अज्ञानियों से किनारा खींचो।(199)
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☆    और यदि शैतान तुम्हें उकसाए तो अल्लाह की शरण माँगो। निश्चय ही, वह सब कुछ सुनता जानता है। (200)

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