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11. हूद    [ कुल आयतें - 123 ]

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सुरु अल्लाह के नाम से
जो बड़ा कृपाशील अत्यन्त दयावान है।
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●═══════════════════✒
☆   अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। यह एक किताब है जिसकी आयतें पक्की हैं, फिर सविस्तार बयान हुई हैं; उसकी ओर से जो अत्यन्त तत्वदर्शी, पूरी ख़बर रखनेवाला है। (1)
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☆    कि "तुम अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो। मैं तो उसकी ओर से तुम्हें सचेत करनेवाला और शुभ सूचना देनेवाला हूँ।" (2)
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☆    और यह कि "अपने रब से क्षमामाँगो, फिर उसकी ओर पलट आओ। वहतुम्हें एक निश्चित अवधि तक सुखोपभोग की उत्तम सामग्री प्रदान करेगा। और बढ़- चढ़कर कर्म करनेवालों पर वह तदधिक अपना अनुग्रह करेगा, किन्तु यदि तुम मुँह फेरते हो तो निश्चय ही मुझे तुम्हारे विषय में एक बड़े दिन की यातना का भय है। (3)
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☆    तुम्हें अल्लाह ही की ओर पलटना है, और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।"(4)
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☆   देखो! ये अपने सीनों को मोड़ते हैं, चाहिए कि उससे छिपें। देखो! जब ये अपने कपड़ों से स्वयं को ढाँकते हैं, वह जानता है जो कुछ वे छिपाते हैं और जो कुछ वे प्रकट करते हैं। निस्संदेह वह सीनों तक की बात को जानता है। (5)
_______________________________
☆   धरती में चलने-फिरनेवाला जो प्राणी भी है उसकी रोज़ी अल्लाह के ज़िम्मे है। वह जानता है जहाँ उसे ठहरना है और जहाँ उसे सौंपा जाना है। सब कुछ एक स्पष्ट किताब में मौजूद है। (6)
_______________________________
☆    वही है जिसने आकाशों और धरती को छः दिनों में पैदा किया - उसका सिंहासन पानी पर था - ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें कर्म कीदृष्टि से कौन सबसे अच्छा है।और यदि तुम कहो कि "मरने के पश्चात तुम अवश्य उठोगे।" तो जिन्हें इनकार है, वे कहने लगेंगे, "यह तो खुला जादू है।"(7)
_______________________________
☆   यदि हम एक निश्चित अवधि तक के लिए उनसे यातना को टाले रखें, तो वे कहने लगेंगे,"आख़िर किस चीज़ ने उसे रोक रखा है?" सुन लो! जिस दिन वह उनपर आ जाएगी तो फिर वह उनपर से टाली नहीं जाएगी। और वही चीज़ उन्हें घेर लेगी जिसका वे उपहास करते हैं। (8)
_______________________________
☆    यदि हम मनुष्य को अपनी दयालुता का रसास्वादन कराकर फिर उसको उससे छीन लॆं, तॊ (वह दयालुता कॆ लिए याचना नहीं करता) निश्चय ही वह निराशावादी, कृतघ्न है। (9)
_______________________________
☆    और यदि हम इसके पश्चात कि उसे तकलीफ़ पहुँची हो, उसे नेमत का रसास्वादन कराते हैं तो वह कहने लगता है, "मेरे तो सारे दुख दूर हो गए।" वह तो फूला नहीं समाता, डींगे मारनेलगता है। (10)
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☆    उनकी बात दूसरी है जिन्होंने धैर्य से काम लिया और सत्कर्म किए। वही है जिनकेलिए क्षमा और बड़ा प्रतिदान है। (11)
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☆    तो शायद तुम उसमें से कुछ छोड़ बैठोगे, जो तुम्हारी ओर प्रकाशना रूप में भेजी जा रहीहै। और तुम इस बात पर तंगदिल हो रहे हो कि वे कहते हैं,"उसपर कोई ख़ज़ाना क्यों नहीं उतरा या उसके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया?" तुम तो केवल सचेत करनेवाले हो। हर चीज़ अल्लाह ही के हवाले है। (12)
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☆    (उन्हें कोई शंका है) या वे कहते हैं कि "उसने इसे स्वयं घड़ लिया है?" कह दो, "अच्छा, यदि तुम सच्चे हो तो इस जैसी घड़ी हुई दस सूरतें ले आओ और अल्लाह से हटकर जिस किसी को बुला सकते हो बुला लो।" (13)
_______________________________
☆    फिर यदि वे तुम्हारी बात न मानें तो जान लो, यह अल्लाह केज्ञान ही के साथ अवतरित हुआ है। और यह कि उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। तो अब क्यातुम मुस्लिम (आज्ञाकारी) होतेहो? (14)
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☆    जो व्यक्ति सांसारिक जीवन और उसकी शोभा का इच्छुक हो तो ऐसे लोगों को उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला हम यहीं दे देते हैं और इसमें उनका कोई हक़ नहीं मारा जाता। (15)
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☆    यही वे लोग हैं जिनके लिए आख़िरत में आग के सिवा और कुछ भी नहीं। उन्होंने जो कुछ बनाया, वह सब वहाँ उनकी जान कोलागू हुआ और उनका सारा किया-धरा मिथ्या होकर रहा। (16)
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☆   फिर क्या वह व्यक्ति जो अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर है और स्वयं उसके रूप में भी एक गवाह उसके साथ-साथ रहता है - और इससे पहले मूसा की किताब भी एक मार्गदर्शक और दयालुता के रूप में उपस्थित रही है- (और वह जो प्रकाश एवं मार्गदर्शन से वंचित है, दोनों बराबर हो सकते हैं) ऐसे ही लोग उसपर ईमान लाते हैं, किन्तु इन गरोहों में से जो उसका इनकार करेगा तो उसके लिएजिस जगह का वादा है, वह तो आग है। अतः तुम्हें इसके विषय में कोई सन्देह न हो। यह तुम्हारे रब की ओर से सत्य है,किन्तु अधिकतर लोग मानते नहीं। (17)
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☆    उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े। ऐसे लोग अपने रब के सामने पेश होंगे और गवाही देनेवाले कहेंगे, "यही लोग हैं जिन्होंने अपने रब पर झूठ घड़ा।" सुन लो! ऐसे अत्याचारियों पर अल्लाह की लानत है। (18)
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☆    जो अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं और उसमें टेढ़ पैदाकरना चाहते हैं; और वही आख़िरत का इनकार करते हैं। (19)
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☆    वे धरती में क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और न अल्लाह से हटकर उनका कोई समर्थक ही है। उन्हें दोहरी यातना दी जाएगी। वे न सुन ही सकते थे औरन देख ही सकते थे। (20)
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☆    ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला और जो कुछ वे घड़ा करते थे, वह सब उनमें गुम होकर रह गया। (21)
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☆   निश्चय ही वही आख़िरत में सबसे बढ़कर घाटे में रहेंगे। (22)
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☆    रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और अपने रब की ओर झुक पड़े वही जन्नतवाले हैं, उसमें वे सदैवरहेंगे। (23)
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☆    दोनों पक्षों की उपमा ऐसी है जैसे एक अन्धा और बहरा हो और एक देखने और सुननेवाला। क्या इन दोनों की दशा समान हो सकती है? तो क्या तुम होश से काम नहीं लेते? (24)
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☆    हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा। (उसने कहा,) "मैं तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देता हूँ। (25)
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☆    यह कि तुम अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो। मुझे तुम्हारे विषय में एक दुखद दिन की यातना का भय है।" (26)
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☆    इसपर उसकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, कहने लगे, "हमारी दृष्टि में तो तुम हमारे ही जैसे आदमी हो और हम देखते हैं कि बस कुछ ऐसेलोग ही तुम्हारे अनुयायी हैं जो पहली दृष्टि में हमारे यहाँ के नीच हैं। हम अपने मुक़ाबले में तुममें कोई बड़ाई नहीं देखते, बल्कि हम तो तुम्हें झूठा समझते हैं।" (27)
_______________________________
☆    उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम्हारा क्या विचार है? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसनेमुझे अपने पास से दयालुता भी प्रदान की है, फिर वह तुम्हें न सूझे तो क्या हम हठात उसे तुमपर चिपका दें, जबकि वह तुम्हें अप्रिय है? (28)
_______________________________
☆   और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इस काम पर तुम से कोई धन नहीं माँगता। मेरा पारिश्रमिक तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है। मैं ईमान लानेवालों को दूर करनेवाला भी नहीं। उन्हें तो अपने रब से मिलना ही है, किन्तु मैं तुम्हें देख रहा हूँ कि तुम अज्ञानी लोग हो। (29)
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☆     और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि मैं उन्हें धुत्कार दूँ तो अल्लाह के मुक़ाबले में कौन मेरी सहायता कर सकता है? फिर क्या तुम होश से काम नहीं लेते? (30)
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☆   और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़जानेहैं और न मुझे परोक्ष का ज्ञान है और न मैं यह कहता हूँकि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ और न उन लोगों के विषय में, जो तुम्हारी दृष्टि में तुच्छ हैं, मैं यह कहता हूँ कि अल्लाह उन्हें कोई भलाई न देगा। जो कुछ उनके जी में है, अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है। (यदि मैं ऐसा कहूँ) तब तो मैं अवश्य ही ज़ालिमों में सेहूँगा।" (31)
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☆    उन्होंने कहा, "ऐ नूह! तुम हमसे झगड़ चुके और बहुत झगड़ चुके। यदि तुम सच्चे हो तो जिसकी तुम हमें धमकी देते हो, अब उसे हम पर ले ही आओ।" (32)
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☆    उसने कहा, "वह तो अल्लाह हीयदि चाहेगा तो तुमपर लाएगा औरतुम क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते। (33)
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☆    अब जबकि अल्लाह ही ने तुम्हें विनष्ट करने का निश्चय कर लिया हो, तो यदि मैंतुम्हारा भला भी चाहूँ, तो मेरा भला चाहना तुम्हें कुछ भी लाभ नहीं पहुँचा सकता। वहीतुम्हारा रब है और उसी की ओर तुम्हें पलटना भी है।" (34)
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☆    (क्या उन्हें कोई खटक है) या वे कहते हैं, "उसने स्वयं इसे घड़ लिया है?" कह दो, "यदि मैंने इसे घड़ लिया है तो मेरे अपराध का दायित्व मुझपर ही है। और जो अपराध तुम कर रहेहो मैं उसके दायित्व से मुक्तहूँ।" (35)
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☆     नूह की ओर प्रकाशना की गई कि "जो लोग ईमान ला चुके हैं, उनके सिवा अब तुम्हारी क़ौम में कोई ईमान लानेवाला नहीं। अतः जो कुछ वे कर रहे हैं उसपरतुम दुखी न हो। (36)
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☆   तुम हमारे समक्ष और हमारी प्रकाशना के अनुसार नाव बनाओ और अत्याचारियों के विषय में मुझसे बात न करो। निश्चय ही वे डूबकर रहेंगे।" (37)
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☆     वह नाव बनाने लगता है। उसकी क़ौम के सरदार जब भी उसके पास से गुज़रते तो उसका उपहास करते। उसने कहा, "यदि तुम हमारा उपहास करते हो तो हम भी तुम्हारा उपहास करेंगे,जैसे तुम हमारा उपहास करते हो। (38)
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☆   अब शीघ्र ही तुम जान लोगे कि कौन है जिसपर ऐसी यातना आती है, जो उसे अपमानित कर देगी और जिसपर ऐसी स्थाई यातना टूट पड़ती है। (39)
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☆    यहाँ तक कि जब हमारा आदेश आगया और तंदूर उबल पड़ा तो हमने कहा, "हर जाति में से दो-दो के जोड़े उसमें चढ़ा लो और अपने घरवालों को भी - सिवायऐसे व्यक्ति के जिसके बारे में बात तय पा चुकी है - और जो ईमान लाया हो उसे भी।" किन्तु उसके साथ जो ईमान लाए थे वे थोड़े ही थे। (40)
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☆   उसने कहा, "उसमें सवार हो जाओ। अल्लाह के नाम से इसका चलना भी है और इसका ठहरना भी। निस्संदेह मेरा रब अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।" (41)
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☆     और वह (नाव) उन्हें लिए हुए पहाड़ों जैसी ऊँची लहर के बीचचल रही थी। नूह ने अपने बेटे को, जो उससे अलग था, पुकारा, "ऐ मेरे बेटे! हमारे साथ सवार हो जा। तू इनकार करनेवालों के साथ न रह।" (42)
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☆    उसने कहा, "मैं किसी पहाड़ से जा लगूँगा, जो मुझे पानी सेबचा लेगा।" कहा, "आज अल्लाह केआदेश (फ़ैसले) से कोई बचानेवाला नहीं है सिवाय उसके जिसपर वह दया करे।" इतने में दोनों के बीच लहर आ पड़ी और डूबनेवालों के साथ वह भी डूब गया। (43)
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☆    और कहा गया, "ऐ धरती! अपना पानी निगल जा और ऐ आकाश! तू थम जा।" अतएव पानी तह में बैठ गयाऔर फ़ैसला चुका दिया गया और वह (नाव) जूदी पर्वत पर टिक गई औऱ कह दिया गया, "फिटकार हो अत्याचारी लोगों पर!" (44)
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☆    नूह ने अपने रब को पुकारा और कहा, "मेरे रब! मेरा बेटा मेरे घरवालों में से है और निस्संदेह तेरा वादा सच्चा है और तू सबसे बड़ा हाकिम भी है।" (45)
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☆    कहा, "ऐ नूह! वह तेरे घरवालों में से नहीं, वह तो सर्वथा एक बिगड़ा काम है। अतःजिसका तुझे ज्ञान नहीं, उसके विषय में मुझसे न पूछ, तेरे नादान हो जाने की आशंका से मैं तुझे नसीहत करता हूँ।" (46)
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☆    उसने कहा, "मेरे रब! मैं इससे तेरी पनाह माँगता हूँ कितुझसे उस चीज़ का सवाल करूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान न हो। अब यदि तूने मुझे क्षमा न किया और मुझपर दया न की, तो मैं घाटे में पड़कर रहूँगा।" (47)
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☆    कहा गया, "ऐ नूह! हमारी ओर से सलामती और उन बरकतों के साथ उतर, जो तुझपर और उन गरोहों पर होगी, जो तेरे साथवालों में से होंगे। कुछ गरोह ऐसे भी होंगे जिन्हें हमथोड़े दिनों का सुखोपभोग कराएँगे। फिर उन्हें हमारी ओर से दुखद यातना आ पहुँचेगी।" (48)
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☆   ये परोक्ष की ख़बरें हैं जिनकी हम तुम्हारी ओर प्रकाशना कर रहे हैं। इससे पहले तो न तुम्हें इनकी ख़बर थी और न तुम्हारी क़ौम को। अतः धैर्य से काम लो। निस्संदेह अन्तिम परिणाम डर रखनेवालों के पक्ष में है।(49)
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☆    और 'आद' की ओर उनके भाई 'हूद' को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य प्रभु नहीं। तुमने तो बस झूठ घड़ रखा है। (50)
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☆    ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता। मेरा पारिश्रमिक तो बस उसके ज़िम्मे है जिसने मुझे पैदा किया। फिर क्या तुम बुद्धि सेकाम नहीं लेते? (51)
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☆    ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अपने रब से क्षमा याचना करो, फिर उसकी ओर पलट आओ। वह तुमपर आकाश को ख़ूब बरसता छोड़ेगा और तुममें शक्ति पर शक्ति की अभिवृद्धि करेगा। तुम अपराधीबनकर मुँह न फेरो।" (52)
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☆    उन्होंने कहा, "ऐ हूद! तू हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर नहीं आया है। तेरे कहने से हम अपने इष्ट -पूज्यों को नहीं छोड़ सकते और न हम तुझपर ईमान लानेवाले हैं। (53)
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☆    हम तो केवल यही कहते हैं किहमारे इष्ट-पूज्यों में से किसी की तुझपर मार पड़ गई है।"उसने कहा, "मैं तो अल्लाह को गवाह बनाता हूँ और तुम भी गवाह रहो कि उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं, (54)
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☆    जिनको तुम साझी ठहराकर उसके सिवा पूज्य मानते हो। अतः तुम सब मिलकर मेरे साथ दाँव-घात लगाकर देखो और मुझे मुहलत न दो। (55)
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☆    मेरा भरोसा तो अल्लाह, अपने रब और तुम्हारे रब, पर है। चलने-फिरनेवाला जो प्राणी भी है, उसकी चोटी तो उसी के हाथ में है। निस्संदेहमेरा रब सीधे मार्ग पर है। (56)
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☆     किन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो तो जो कुछ देकर मुझे तुम्हारी ओर भेजा गया था, वह तो मैं तुम्हें पहुँचा ही चुका। मेरा रब तुम्हारे स्थान पर दूसरी किसी क़ौम को लाएगा और तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे। निस्संदेह मेरा रब हर चीज़ की देख-भाल कररहा है।" (57)
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☆    और जब हमारा आदेश आ पहुँचा तो हमने हूद और उसके साथ के ईमान लानेवालों को अपनी दयालुता से बचा लिया। और एक कठोर यातना से हमने उन्हें छुटकारा दिया। (58)
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☆    ये आद हैं, जिन्होंने अपने रब की आयतों का इनकार किया; उसके रसूलों की अवज्ञा की और हर सरकश विरोधी के पीछे चलते रहे। (59)
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☆    इस संसार में भी लानत ने उनका पीछा किया और क़ियामत केदिन भी, "सुन लो! निस्संदेह आद ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया। सुनो! विनष्ट हो आद, हूदकी क़ौम।" (60)
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☆   समूद की ओर उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई अन्य पूज्य-प्रभु नहीं। उसी ने तुम्हें धरती से पैदा किया और उसमें तुम्हें बसाया अतः उससे क्षमा माँगो; फिर उसकी ओर पलट आओ। निस्संदेह मेरा रब निकट है, प्रार्थनाओं को स्वीकार करनेवाला भी।"(61)
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☆    उन्होंने कहा, "ऐ सालेह! इससे पहले तू हमारे बीच ऐसा व्यक्ति था जिससे बड़ी आशाएँ थीं। क्या तू हमें उनको पूजनेसे रोकता है जिनकी पूजा हमारेबाप-दादा करते रहे हैं? जिनकीओर तू हमें बुला रहा है उसके विषय में तो हमें संदेह है जो हमें दुविधा में डाले हुए है।" (62)
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☆    उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुमने सोचा? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपनी ओर से दयालुता प्रदान कीहै, तो यदि मैं उसकी अवज्ञा करूँ तो अल्लाह के मुक़ाबले में कौन मेरी सहायता करेगा? तुम तो और अधिक घाटे में डाल देने के अतिरिक्त मेरे हक़ में और कोई अभिवृद्धि नहीं करोगे। (63)
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☆    ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है। इसे छोड़ दो कि अल्लाह की धरती में खाए और इसे तकलीफ़ देने के लिए हाथ न लगाना अन्यथा समीपस्थ यातना तुम्हें आ लेगी।" (64)
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☆    किन्तु उन्होंने उसकी कूचें काट डालीं। इसपर उसने कहा, "अपने घरों में तीन दिन और मज़े ले लो। यह ऐसा वादा है, जो झूठा सिद्ध न होगा।" (65)
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☆   फिर जब हमारा आदेश आ पहुँचा, तो हमने अपनी दयालुतासे सालेह को और उसके साथ के ईमान लानेवालों को बचा लिया, और उस दिन के अपमान से उन्हें सुरक्षित रखा। वास्तव में, तुम्हारा रब बड़ा शक्तिवान, प्रभुत्वशाली है। (66)
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☆   और अत्याचार करनेवालों को एक भयंकर चिंघार ने आ लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए, (67)
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☆   मानो वे वहाँ कभी बसे ही न थे। "सुनो! समूद ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया। सुन लो! फिटकार हो समूद पर!" (68)
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☆    और हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) इबराहीम के पास शुभ सूचना लेकर पहुँचे। उन्होंने कहा, "सलाम हो!" उसनेभी कहा, "सलाम हो।" फिर उसने कुछ विलम्ब न किया, एक भुना हुआ बछड़ा ले आया। (69)
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☆    किन्तु जब देखा कि उनके हाथ उसकी ओर नहीं बढ़ रहे हैं तो उसने उन्हें अजनबी समझा औरदिल में उनसे डरा। वे बोले,"डरो नहीं, हम तो लूत की क़ौम की ओर भेजे गए हैं।" (70)
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☆    उसकी स्त्री भी खड़ी थी। वह इसपर हँस पड़ी। फिर हमने उसको इसहाक़ और इसहाक़ के बादयाक़ूब की शुभ सूचना दी। (71)
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☆   वह बोली, "हाय मेरा हतभाग्य! क्या मैं बच्चे को जन्म दूँगी, जबकि मैं वृद्धा हूँ और ये मेरे पति हैं बूढ़े? यह तो बड़ी ही अद्भुत बात है!"(72)
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☆    वे बोले, "क्या अल्लाह के आदेश पर तुम आश्चर्य करती हो? घरवालो! तुम लोगों पर तो अल्लाह की दयालुता और उसकी बरकतें हैं। वह निश्चय ही प्रशंसनीय, गौरववाला है।" (73)
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☆   फिर जब इबराहीम की घबराहट दूर हो गई और उसे शुभ सूचना भीमिली तो वह लूत की क़ौम के विषय में हम से झगड़ने लगा। (74)
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☆   निस्संदेह इबराहीम बड़ा ही सहनशील, कोमल हृदय, हमारी ओर रुजू (प्रवृत्त) होनेवाला था। (75)
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☆    "ऐ इबराहीम! इसे छोड़ दो। तुम्हारे रब का आदेश आ चुका है और निश्चय ही उनपर न टलनेवाली यातना आनेवाली है।"(76)
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☆    और जब हमारे दूत लूत के पासपहुँचे तो वह उनके कारण अप्रसन्न हुआ और उनके मामले में दिल तंग पाया। कहने लगा,"यह तो बड़ा ही कठिन दिन है।" (77)
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☆   उसकी क़ौम के लोग दौड़ते हुए उसके पास आ पहुँचे। वे पहले से ही दुष्कर्म किया करते थे। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ (विधिवत विवाह के लिए) मौजूद हैं। ये तुम्हारे लिए अधिक पवित्र हैं। अतः अल्लाह का डर रखो और मेरे अतिथियों के विषय में मुझे अपमानित न करो। क्या तुममें एक भी अच्छी समझ का आदमी नहीं?"(78)
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☆    उन्होंने कहा, "तुझे तो मालूम है कि तेरी बेटियों से हमें कोई मतलब नहीं। और हम जो चाहते हैं, उसे तू भली-भाँति जानता है।" (79)
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☆    उसने कहा, "क्या ही अच्छा होता मुझमें तुमसे मुक़ाबले की शक्ति होती या मैं किसी सुदृढ़ आश्रय की शरण ही ले सकता।" (80)
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☆    उन्होंने कहा, "ऐ लूत! हम तुम्हारे रब के भेजे हुए हैं।वे तुम तक कदापि नहीं पहुँच सकते। अतः तुम रात के किसी हिस्से में अपने घरवालों को लेकर निकल जाओ और तुममें से कोई पीछे पलटकर न देखे। हाँ, तुम्हारी स्त्री का मामला और है। उसपर भी वही कुछ बीतनेवाला है, जो उनपर बीतेगा। निर्धारित समय उनके लिए प्रातःकाल का है। तो क्याप्रातःकाल निकट नहीं?" (81)
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☆    फिर जब हमारा आदेश आ पहुँचा तो हमने उसको तलपट कर दिया और उसपर कंकरीले पत्थर ताबड़-तोड़ बरसाए, (82)
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☆    जो तुम्हारे रब के यहाँ चिन्हित थे। और वे अत्याचारियों से कुछ दूर भी नहीं। (83)
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☆   मदयन की ओर उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो,उसकेसिवा तुम्हारा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। और नाप और तौल में कमी नकरो। मैं तो तुम्हें अच्छी दशा में देख रहा हूँ, किन्तु मुझे तुम्हारे विषय में एक घेर लेनेवाले दिन की यातना काभय है।(84)
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☆    ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इनसाफ़ के साथ नाप और तौल को पूरा रखो। और लोगों को उनकी चीज़ों में घाटा न दो और धरती में बिगाड़ पैदा करनेवाले बनकर अपने मुँह को कलूषित न करो। (85)
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☆    यदि तुम मोमिन हो तो जो अल्लाह के पास शेष रहता है वही तुम्हारे लिए उत्तम है। मैं तुम्हारे ऊपर कोई नियुक्त रखवाला नहीं हूँ।" (86)
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☆    वे बोले, "ऐ शुऐब! क्या तेरी नमाज़ तुझे यही सिखाती है कि उन्हें हम छोड़ दें जिन्हें हमारे बाप-दादा पूजते आए हैं या यह कि हम अपनेमाल का उपभोग अपनी इच्छानुसार न करें? बस एक तू ही तो बड़ा सहनशील, समझदार रह गया है!" (87)
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☆    उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम्हारा क्या विचार है? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसनेमुझे अपनी ओर से अच्छी आजीविका भी प्रदान की (तो झुठलाना मेरे लिए कितना हानिकारक होगा!)। और मैं नहीं चाहता कि जिन बातों से मैं तुम्हें रोकता हूँ स्वयं तुम्हारे विपरीत उनको करने लगूँ। मैं तो अपने बस भर केवल सुधार चाहता हूँ। मेरा काम बनना तो अल्लाह ही की सहायता से सम्भव है। उसी पर मेरा भरोसा है और उसी की ओर मैं रुजू करता हूँ। (88)
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☆   ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरे प्रति तुम्हारा विरोध कहीं तुम्हें उस अपराध पर न उभारे कि तुमपर भी वही बीते जो नूह की क़ौम या हूद की क़ौम या सालेह की क़ौम पर बीत चुका है,और लूत की क़ौम तो तुमसे कुछ दूर भी नहीं।(89)
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☆    अपने रब से क्षमा माँगो और फिर उसकी ओर पलट आओ। मेरा रब तो बड़ा दयावन्त, बहुत प्रेम करनेवाला है।" (90)
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☆   उन्होंने कहा, "ऐ शुऐब! तेरी बहुत-सी बातों को समझने में तो हम असमर्थ हैं। और हम तो तुझे देखते हैं कि तू हमारे मध्य अत्यन्त निर्बल है। यदि तेरे भाई-बन्धु न होते तो हम पत्थर मार-मारकर कभी का तुझे समाप्त कर चुके होते। तू इतने बल-बूतेवाला तोनहीं कि हमपर भारी हो।" (91)
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☆   उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मेरे भाई-बन्धु तुमपर अल्लाह से भी ज़्यादा भारी हैं कि तुमने उसे अपने पीछे डाल दिया? तुम जो कुछ भी करते हो निश्चय ही मेरे रब ने उसे अपने घेरे में ले रखा है।(92)
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☆    ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम अपनी जगह कर्म करते रहो, मैं भी कर रहा हूँ। शीघ्र ही तुमको ज्ञात हो जाएगा कि किसपर वह यातना आती है, जो उसेअपमानित करके रहेगी, और कौन है जो झूठा है! प्रतीक्षा करो,मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहा हूँ।" (93)
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☆    अन्ततः जब हमारा आदेश आ पहुँचा तो हमने अपनी दयालुता से शुऐब और उसके साथ के ईमान लानेवालों को बचा लिया। और अत्याचार करनेवालों को एक प्रचंड चिंघार ने आ लिया और वे अपने घरों में अचेत औंधे पड़े रह गए, (94)
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☆    मानो वे वहाँ कभी बसे ही न थे। "सुन लो! फिटकार है मदयनवालों पर, जैसे समूद पर फिटकार हुई!" (95)
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☆   और हमने मूसा को अपनी निशानियाँ और स्पष्ट प्रमाण के साथ। (96)
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☆     फ़िरऔन और उसके सरदारों केपास भेजा, किन्तु वे फ़िरऔन ही के कहने पर चले, हालाँकि फ़िरऔन की बात कोई ठीक बात न थी। (97)
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☆    क़ियामत के दिन वह अपनी क़ौम के लोगों के आगे होगा - और उसने उन्हें आग में जा उतारा, और बहुत ही बुरा घाट हैवह उतरने का! (98)
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☆   यहाँ भी लानत ने उनका पीछा किया और क़ियामत के दिन भी - बहुत ही बुरा पुरस्कार है यह जो किसी को दिया जाए! (99)
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☆   ये बस्तियों के कुछ वृत्तान्त हैं, जो हम तुम्हेंसुना रहे हैं। इनमें कुछ तो खड़ी हैं और कुछ की फ़सल कट चुकी है। (100)
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☆   हमने उनपर अत्याचार नहीं किया, बल्कि उन्होंने स्वयं अपने आप पर अत्याचार किया। फिर जब तेरे रब का आदेश आ गया तो उनके वे पूज्य, जिन्हें वे अल्लाह से हटकर पुकारा करते थे, उनके कुछ भी काम न आ सके। उन्होंने विनाश के अतिरिक्त उनके लिए किसी और चीज़ में अभिवृद्धि नहीं की। (101)
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☆     तेरे रब की पकड़ ऐसी ही होती है, जब वह किसी ज़ालिम बस्ती को पकड़ता है। निस्संदेह उसकी पकड़ बड़ी दुखद, अत्यन्त कठोर होती है। (102)
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☆     निश्चय ही इसमें उस व्यक्ति के लिए एक निशानी है जो आख़िरत की यातना से डरता हो। वह एक ऐसा दिन होगा, जिसमें सारे ही लोग एकत्र किएजाएँगे और वह एक ऐसा दिन होगा,जिसमें सब कुछ आँखों के सामनेहोगा, (103)
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☆    हम उसे केवल थोड़ी अवधि के लिए ही लग रहे हैं; (104)
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☆    जिस दिन वह आएगा, तो उसकी अनुमति के बिना कोई व्यक्ति बात तक न कर सकेगा। फिर (मानवों में) कोई तो उनमें अभागा होगा और कोई भाग्यशाली। (105)
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☆     तो जो अभागे होंगे, वे आग में होंगे; जहाँ उन्हें आर्तनाद करना और फुँकार मारना है। (106)
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☆    वहाँ वे सदैव रहेंगे, जब तकआकाश और धरती स्थिर रहें, बात यह है कि तुम्हारे रब की इच्छा ही चलेगी। तुम्हारा रब जो चाहे करे। (107)
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☆    रहे वे जो भाग्यशाली होंगेतो वे जन्नत में होंगे, जहाँ वे सदैव रहेंगे जब तक आकाश और धरती स्थिर रहें। बात यह है कि तुम्हारे रब की इच्छा ही चलेगी। यह एक ऐसा उपहार है, जिसका सिलसिला कभी न टूटेगा। (108)
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☆    अतः जिनको ये पूज रहे हैं, उनके विषय में तुझे कोई संदेहन हो। ये तो बस उसी तरह पूजा किए जा रहे हैं, जिस तरह इससे पहले इनके बाप-दादा पूजा करतेरहे हैं। हम तो इन्हें इनका हिस्सा बिना किसी कमी के पूरा-पूरा देनेवाले हैं। (109)
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☆    हम मूसा को भी किताब दे चुके हैं। फिर उसमें भी विभेदकिया गया था। यदि तुम्हारे रबकी ओर से एक बात पहले ही निश्चित न कर दी गई होती तो उनके बीच कभी का फ़ैसला कर दिया गया होता। ये उसकी ओर से असमंजस में डाल देनेवाले संदेह में पड़े हुए हैं। (110)
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☆  निश्चय ही समय आने पर एक-एकको, जितने भी हैं उनको तुम्हारा रब उनका किया पूरा-पूरा देकर रहेगा। वे जो कुछ कर रहे हैं, निस्संदेह उसे उसकी पूरी ख़बर है। (111)
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☆    अतः जैसा तुम्हें आदेश हुआहै, जमे रहो और तुम्हारे साथ के तौबा करनेवाले भी जमे रहें, और सीमोल्लंघन न करना। जो कुछ भी तुम करते हो, निश्चयही वह उसे देख रहा है। (112)
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☆    उन लोगों की ओर तनिक भी न झुकना, जिन्होंने अत्याचार की नीति अपनाई है, अन्यथा आग तुम्हें आ लिपटेगी - और अल्लाह से हटकर तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र नहीं - फिर तुम्हें कोई सहायता भी न मिलेगी।(113)
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☆    और नमाज़ क़ायम करो दिन के दोनों सिरों पर और रात के कुछ हिस्से में। निस्संदेह नेकियाँ बुराइयों को दूर कर देती हैं। यह याद रखनेवालों के लिए एक अनुस्मरण है। (114)
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☆    और धैर्य से काम लो, इसलिए कि अल्लाह सुकर्मियों का बदला अकारथ नहीं करता; (115)
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☆   फिर तुमसे पहले जो नस्लें गुज़र चुकी हैं उनमें ऐसे भले-समझदार क्यों न हुए जो धरती में बिगाड़ से रोकते, उन थोड़े-से लोगों के सिवा जिनकोउनमें से हमने बचा लिया। अत्याचारी लोग तो उसी सुख-सामग्री के पीछे पड़े रहे, जिसमें वे रखे गए थे। वे तो थे ही अपराधी। (116)
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☆    तुम्हारा रब तो ऐसा नहीं है कि बस्तियों को अकारण विनष्ट कर दे, जबकि वहाँ के निवासी बनाव और सुधार में लगेहों। (117)
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☆    और यदि तुम्हारा रब चाहता तो वह सारे मनुष्यों को एक समुदाय बना देता, किन्तु अब तो वे सदैव विभेद करते ही रहेंगे, (118)
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☆    सिवाय उनके जिनपर तुम्हारा रब दया करे और इसी के लिए उसने उन्हें पैदा कियाहै, और तुम्हारे रब की यह बात पूरी होकर रही कि "मैं जहन्नम को अपराधी जिन्नों और मनुष्यों सबसे भरकर रहूँगा।" (119)
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☆    रसूलों के वृत्तान्तों में से हर वह कथा जो हम तुम्हें सुनाते हैं उसके द्वारा हम तुम्हारे हृदय को सुदृढ़ करते हैं। और इसमें तुम्हारे पास सत्य आ गया है और मोमिनों के लिए उपदेश और अनुस्मरण भी। (120)
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☆    जो लोग ईमान नहीं ला रहे हैं उनसे कह दो, "तुम अपनी जगह कर्म किए जाओ, हम भी कर्म कर रहे हैं। (121)
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☆   तुम भी प्रतीक्षा करो, हम भी प्रतीक्षा कर रहे हैं।" (122)
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☆     अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों और धरती में छिपा है, और हर मामला उसी की ओर पलटता है। अतः उसी की बन्दगी करो और उसी पर भरोसा रखो। जो कुछ तुम करते हो, उससे तुम्हारा रब बेख़बर नहीं है। (123)
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