feat0

Another Post with Everything In It

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetuer adipiscing elit. Curabitur quam augue, vehicula quis, tincidunt vel, varius vitae, nulla. Sed convallis orci. Duis libero orci, pretium a, convallis quis, pellentesque a, dolor. Curabitur vitae nisi non dolor vestibulum consequat.

Read More
feat2

A Post With Everything In It

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetuer adipiscing elit. Curabitur quam augue, vehicula quis, tincidunt vel, varius vitae, nulla. Sed convallis orci. Duis libero orci, pretium a, convallis quis, pellentesque a, dolor. Curabitur vitae nisi non dolor vestibulum consequat.

Read More
feat3

Quotes Time!

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetuer adipiscing elit. Curabitur quam augue, vehicula quis, tincidunt vel, varius vitae, nulla. Sed convallis orci. Duis libero orci, pretium a, convallis quis, pellentesque a, dolor. Curabitur vitae nisi non dolor vestibulum consequat. Proin vestibulum. Ut ligula. Nullam sed dolor id odio volutpat pulvinar. Integer a leo. In et eros

Read More
feat4

Another Text-Only Post

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetuer adipiscing elit. Sed eleifend urna eu sapien. Quisque posuere nunc eu massa. Praesent bibendum lorem non leo. Morbi volutpat, urna eu fermentum rutrum, ligula lacus interdum mauris, ac pulvinar libero pede a enim. Etiam commodo malesuada ante. Donec nec ligula. Curabitur mollis semper diam.

Read More
feat5

A Simple Post with Text

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetuer adipiscing elit. Sed eleifend urna eu sapien. Quisque posuere nunc eu massa. Praesent bibendum lorem non leo. Morbi volutpat, urna eu fermentum rutrum, ligula lacus interdum mauris, ac pulvinar libero pede a enim. Etiam commodo malesuada ante. Donec nec ligula. Curabitur mollis semper diam.

Read More

8. अल-अनफ़ाल [ कुल आयतें - 75 ]

Posted by . | | Category: |

सुरु अल्लाह के नाम से
जो बड़ा कृपाशील अत्यन्त दयावान है।
www.achhiblog.blogspot.in
« सूरह (अध्याय ) « Go To
पिछला / अगला (अध्याय)
Next / Privew
●═══════════════════✒
☆   वे तुमसे ग़नीमतों के विषय में पूछते हैं। कहो,"ग़नीमतें अल्लाह और रसूल की हैं। अतः अल्लाह का डर रखो और आपस के सम्बन्धों को ठीक रखो।और, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो, यदि तुम ईमानवाले हो। (1)
_______________________________
☆    ईमानवाले तो वही लोग हैं जिनके दिल उस समय काँप उठें जबकि अल्लाह को याद किया जाए।और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाएँ तो वे उनके ईमान को और अधिक बढ़ा दें और वे अपने रब पर भरोसा रखते हों। (2)
_______________________________
☆    ये वे लोग हैं जो नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं। (3)
_______________________________
☆   वही लोग वास्तव में ईमानवाले हैं। उनके लिए उनके रब के पास बड़े दर्जे हैं और क्षमा और सम्मानित उत्तम आजीविका भी।(4)
_______________________________
☆    (यह बिल्कुल वैसी ही परिस्थिति है) जैसे तुम्हारे रब ने तुम्हें तुम्हारे घर सेएक उद्देश्य के साथ निकाला, किन्तु ईमानवालों में से एक गरोह को यह अप्रिय लगा था।(5)
_______________________________
☆     वे सत्य के विषय में उसके स्पष्ट हो जाने के पश्चात तुमसे झगड़ रहे थे। मानो वे आँखों देखी मृत्यु की ओर हाँके जा रहे हों। (6)
_______________________________
☆    और याद करो जब अल्लाह तुमसे वादा कर रहा था कि दो गरोहों में से एक तुम्हारे हाथ आएगा और तुम चाहते थे कि तुम्हें वह हाथ आए, जो निःशस्त्र था, हालाँकि अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों से सत्य को सत्य कर दिखाए और इनकार करनेवालों की जड़ काट दे। (7)
_______________________________
☆    ताकि सत्य को सत्य कर दिखाए और असत्य को असत्य, चाहे अपराधियों को कितना ही अप्रिय लगे। (8)
_______________________________
☆     याद करो जब तुम अपने रब से फ़रियाद कर रहे थे, तो उसने तुम्हारी पुकार सुन ली। (उसनेकहा,) "मैं एक हज़ार फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करूँगा जो तुम्हारे साथी होंगे।" (9)
_______________________________
☆   अल्लाह ने यह केवल इसलिए किया कि यह एक शुभ-सूचना हो औरताकि इससे तुम्हारे हृदय संतुष्ट हो जाएँ। सहायता अल्लाह ही के यहाँ से होती है। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है। (10)
_______________________________
☆     याद करो जबकि वह अपनी ओर सेचैन प्रदान कर तुम्हें ऊँघ सेढँक रहा था और वह आकाश से तुमपर पानी बरसा रहा था, ताकि उसके द्वारा तुम्हें अच्छी तरह पाक करे और शैतान की गन्दगी तुमसे दूर करे और तुम्हारे दिलों को मज़बूत करे और उसके द्वारा तुम्हारे क़दमों को जमा दे। (11)
_______________________________
☆    याद करो जब तुम्हारा रब फ़रिश्तों की ओर प्रकाशना (वह्य्) कर रहा था कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ। अतः तुम ईमानवालों को जमाए रखो। मैं इनकार करनेवालों के दिलों में रोब डाले देता हूँ। तो तुम उनकी गरदनें मारो और उनकेपोर-पोर पर चोट लगाओ!" (12)
_______________________________
☆    यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोधकिया। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे (उसे कठोर यातना मिलकर रहेगी) क्योंकि अल्लाह कड़ी यातना देनेवाला है। (13)
_______________________________
☆    यह तो तुम चखो! और यह कि इनकार करनेवालों के लिए आग कीयातना है। (14)
_______________________________
☆    ऐ ईमान लानेवालो! जब एक सेना के रूप में तुम्हारा इनकार करनेवालों से मुक़ाबलाहो तो पीठ न फेरो। (15)
_______________________________
☆    जिस किसी ने भी उस दिन उनसेअपनी पीठ फेरी - यह और बात है कि युद्ध-चाल के रूप में या दूसरी टुकड़ी से मिलने के लिएऐसा करे - तो वह अल्लाह के प्रकोप का भागी हुआ और उसका ठिकाना जहन्नम है, और क्या ही बुरी जगह है वह पहुँचने की! (16)
_______________________________
☆   तुमने उन्हें क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ही ने उन्हें क़त्ल किया और जब तुमने (उनकी ओर मिट्टी और कंकड़) फेंका, तो तुमने नहीं फेंका बल्कि अल्लाह ने फेंका (कि अल्लाह अपनी गुण-गरिमा दिखाए) और ताकि अपनी ओर से ईमानवालों के गुण प्रकट करे। निस्संदेह अल्लाह सुनता, जानता है।(17)
_______________________________
☆    यह तो हुआ, और यह (जान लो) किअल्लाह इनकार करनेवालों की चाल को कमज़ोर कर देनेवाला है। (18)
_______________________________
☆    यदि तुम फ़ैसला चाहते हो तो फ़ैसला तुम्हारे सामने आ चुका और यदि बाज़ आ जाओ तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है। लेकिन यदि तुमने पलटकर फिर वही हरकत की तो हम भी पलटेंगे और तुम्हारा जत्था, चाहे वह कितना ही अधिक हो, तुम्हारे कुछ काम न आ सकेगा। और यह कि अल्लाह मोमिनों के साथ होता है। (19)
_______________________________
☆    ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करो और उससे मुँह न फेरो जबकि तुम सुन रहे हो। (20)
_______________________________
☆   और उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने कहा था, "हमने सुना" हालाँकि वे सुनते नहीं।(21)
_______________________________
☆    अल्लाह की दृष्टि में तो निकृष्ट पशु वे बहरे-गूँगे लोग हैं, जो बुद्धि से काम नहीं लेते। (22)
_______________________________
☆    यदि अल्लाह जानता कि उनमेंकुछ भी भलाई है, तो वह उन्हें अवश्य सुनने का सौभाग्य प्रदान करता। और यदि वह उन्हें सुना देता तो भी वे कतराते हुए मुँह फेर लेते। (23)
_______________________________
☆    ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह और रसूल की बात मानो, जब वह तुम्हें उस चीज़ की ओर बुलाए जो तुम्हें जीवन प्रदान करनेवाली है, और जान रखो कि अल्लाह आदमी और उसके दिल के बीच आड़े आ जाता है और यह कि वही है जिसकी ओर (पलटकर) तुम एकत्र होगे। (24)
_______________________________
☆    बचो उस फ़ितने से जो अपनी लपेट में विशेष रूप से केवल अत्याचारियों को ही नहीं लेगा, जान लो अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है। (25)
_______________________________
☆    और याद करो जब तुम थोड़े थे, धरती में निर्बल थे, डरे-सहमे रहते कि लोग कहीं तु्म्हें उचक न ले जाएँ, फिर उसने तुम्हें ठिकाना दिया और अपनी सहायता से तुम्हें शक्ति प्रदान की और अच्छी-स्वच्छ चीज़ों की तुम्हें रोज़ी दी, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ। (26)
_______________________________
☆    ऐ ईमान लानेवालो! जानते-बूझते तुम अल्लाह और उसके रसूल के साथ विश्वासघात न करना और न अपनी अमानतों में ख़ियानत करना।(27)
_______________________________
☆    और जान रखो कि तुम्हारे माल और तुम्हारी संतान परीक्षा-सामग्री हैं और यह किअल्लाह के पास बड़ा प्रतिदान है। (28)
_______________________________
☆    ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम अल्लाह का डर रखोगे तो वह तुम्हें एक विशिष्टता प्रदानकरेगा और तुमसे तुम्हारी बुराइयाँ दूर करेगा और तुम्हें क्षमा करेगा। अल्लाहबड़ा अनुग्राहक है। (29)
_______________________________
☆    और याद करो जब इनकार करनेवाले तुम्हारे साथ चालेंचल रहे थे कि तुम्हें क़ैद रखें या तुम्हें क़त्ल कर देंया तुम्हें निकाल बाहर करें। वे अपनी चालें चल रहे थे और अल्लाह भी अपनी चाल चल रहा था। अल्लाह सबसे अच्छी चाल चलता है। (30)
_______________________________
☆    जब उनके सामने हमारी आयतेंपढ़ी जाती हैं, तो वे कहते हैं, "हम सुन चुके। यदि हम चाहें तो ऐसी बातें हम भी बना लें; ये तो बस पहले के लोगों की कहानियाँ हैं।" (31)
_______________________________
☆    और याद करो जब उन्होंने कहा, "ऐ अल्लाह! यदि यही तेरे यहाँ से सत्य हो तो हमपर आकाश से पत्थर बरसा दे, या हम पर कोई दुखद यातना ही ले आ। (32)
_______________________________
☆    और अल्लाह ऐसा नहीं कि तुम उनके बीच उपस्थित हो और वह उन्हें यातना देने लग जाए, और न अल्लाह ऐसा है कि वे क्षमा-याचना कर रहे हों और वह उन्हें यातना से ग्रस्त कर दे। (33)
_______________________________
☆    किन्तु अब क्या है उनके पास कि अल्लाह उन्हें यातना नदे, जबकि वे 'मस्जिदे-हराम' (काबा) से रोकते हैं, हालाँकि वे उसके कोई व्यवस्थापक नहीं?उसके व्यवस्थापक तो केवल डर रखनेवाले ही हैं, परन्तु उनकेअधिकतर लोग जानते नहीं। (34)
_______________________________
☆   उनकी नमाज़़ इस घर (काबा) के पास सीटियाँ बजाने और तालियाँ पीटने के अलावा कुछ भी नहीं होती। तो अब यातना का मज़ा चखो, उस इनकार के बदले में जो तुम करते रहे हो।(35)
_______________________________
☆  निश्चय ही इनकार करनेवाले अपने माल अल्लाह के मार्ग से रोकने के लिए ख़र्च करते हैं।वे तो उनको ख़र्च करते रहेंगे, फिर यही उनके लिए पश्चाताप बनेगा। फिर वे पराभूत होंगे और इनकार करनेवाले जहन्नम की ओर समेट लाए जाएँगे।(36)
_______________________________
☆    ताकि अल्लाह नापाक को पाक से छाँटकर अलग करे और नापाकोंको आपस में एक-दूसरे पर रखकर ढेर बनाए, फिर उसे जहन्नम में डाल दे। यही लोग घाटे में पड़नेवाले हैं। (37)
_______________________________
☆    उन इनकार करनेवालों से कह दो कि वे यदि बाज़ आ जाएँ तो जो कुछ हो चुका, उसे क्षमा कर दिया जाएगा, किन्तु यदि वे फिर भी वही करेंगे तो पूर्ववर्ती लोगों के सिलसिलेमें जो रीति अपनाई गई वह सामने से गुज़र चुकी है। (38)
_______________________________
☆    उनसे युद्ध करो, यहाँ तक किफ़ितना बाक़ी न रहे और दीन (धर्म) पूरा का पूरा अल्लाह हीके लिए हो जाए। फिर यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अल्लाह उनके कर्म को देख रहा है। (39)
_______________________________
☆     किन्तु यदि वे मुँह मोड़ेंतो जान रखो कि अल्लाह तुम्हारा संरक्षक है। क्या ही अच्छा संरक्षक है वह, और क्या ही अच्छा सहायक! (40)
_______________________________
☆   और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ ग़नीमत के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पाँचवा भाग अल्लाह का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफ़िरों का है। यदि तुम अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान रखते हो, जो हमनेअपने बन्दे पर फ़ैसले के दिन उतारी, जिस दिन दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हुई, और अल्लाह को हर चीज़ की पूर्ण सामर्थ्यप्राप्त है। (41)
_______________________________
☆    याद करो जब तुम घाटी के निकटवर्ती छोर पर थे और वे घाटी के दूरस्थ छोर पर थे और क़ाफ़िला तुमसे नीचे की ओर था। यदि तुम परस्पर समय निश्चित किए होते तो अनिवार्यतः तुम निश्चित समय पर न पहुँचते। किन्तु जो कुछ हुआ वह इसलिए कि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे, जिसका पूरा होना निश्चित था, ताकि जिसे विनष्ट होना हो, वह स्पष्ट प्रमाण देखकर ही विनष्ट हो और जिसे जीवित रहनाहो वह स्पष्ट़ प्रमाण देखकर जीवित रहे। निस्संदेह अल्लाहभली-भाँति जानता, सुनता है। (42)
_______________________________
☆    और याद करो जब अल्लाह उनको तुम्हारे स्वप्न में थोड़ा करके तुम्हें दिखा रहा था और यदि वह उन्हें ज़्यादा करके तुम्हें दिखा देता तो अवश्य ही तुम हिम्मत हार बैठते और असल मामले में झगड़ने लग जाते, किन्तु अल्लाह ने इससे बचा लिया। निश्चय ही वह तो जो कुछ दिलों में होता है उसे भी जानता है। (43)
_______________________________
☆    याद करो जब तुम्हारी परस्पर मुठभेड़ हुई तो वह तुम्हारी निगाहों में उन्हेंकम करके और तुम्हें उनकी निगाहों में कम करके दिखा रहाथा, ताकि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे जिसका होना निश्चित था। और सारे मामले अल्लाह ही की ओर पलटते हैं। (44)
_______________________________
☆    ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम्हारा किसी गरोह से मुक़ाबला हो जाए तो जमे रहो और अल्लाह को ज़्यादा याद करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो। (45)
_______________________________
☆     और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो और आपस में न झगड़ो, अन्यथा हिम्मत हार बैठोगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। और धैर्य से काम लो। निश्चय ही, अल्लाह धैर्यवानों के साथ है। (46)
_______________________________
☆    और उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते और लोगों को दिखाते निकले थे और वे अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं, हालाँकि जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह उसे अपने घेरे में लिए हुए है। (47)
_______________________________
☆    और याद करो जब शैतान ने उनके कर्म उनके लिए सुन्दर बना दिए और कहा, "आज लोगों में से कोई भी तुमपर प्रभावी नहींहो सकता। मैं तुम्हारे साथ हूँ।" किन्तु जब दोनों गरोह आमने-सामने हुए तो वह उलटे पाँव फिर गया और कहने लगा,"मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं। मैं वह कुछ देख रहा हूँ,जो तुम्हें नहीं दिखाई देता। मैं अल्लाह से डरता हूँ, और अल्लाह कठोर यातना देनेवाला है।" (48)
_______________________________
☆    याद करो जब कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है, कह रहे थे, "इन लोगों को तो इनके धर्म ने धोखे में डाल रखा है।" हालाँकि जो अल्लाह पर भरोसा रखता है, तो निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।(49)
_______________________________
☆    क्या ही अच्छा होता कि तुम देखते जब फ़रिश्ते इनकार करनेवालों के प्राण ग्रस्त करते हैं! वे उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारते जाते हैंकि "लो अब जलने की यातना का मज़ा चखो।" (तो उनकी दुर्दशा का अन्दाज़ा कर सकते) (50)
_______________________________
☆    यह तो उसी का बदला है जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा और यह कि अल्लाह अपने बन्दों पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता। (51)
_______________________________
☆    इनके साथ वैसा ही मामला पेश आया जैसा फ़िरऔन के लोगोंऔर उनसे पहले के लोगों के साथ पेश आया। उन्होंने अल्लाह की आयतों का इनकार किया तो अल्लाह ने उनके गुनाहों के कारण उन्हें पकड़ लिया। निस्संदेह अल्लाह शक्तिशाली,कठोर यातना देनेवाला है। (52)
_______________________________
☆    यह इसलिए हुआ कि अल्लाह उस उदार अनुग्रह (नेमत) को, जो उसने किसी क़ौम पर किया हो, बदलनेवाला नहीं है, जब तक कि लोग उस चीज़ को न बदल डालें, जिसका सम्बन्ध स्वयं उनसे है। और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है। (53)
_______________________________
☆   जैसे फ़िरऔनियों और उनसे पहले के लोगों का हाल हुआ। उन्होंने अपने रब की आयतों कोझुठलाया तो हमने उन्हें उनके गुनाहों के बदले में विनष्ट कर दिया और फ़िरऔनियों को डूबो दिया। ये सभी अत्याचारी थे। (54)
_______________________________
☆    निश्चय ही, सबसे बुरे प्राणी अल्लाह की दृष्टि में वे लोग हैं, जिन्होंने इनकार किया। फिर वे ईमान नहीं लाते।(55)
_______________________________
☆   जिनसे तुमने वचन लिया वे फिर हर बार अपने वचन को भंग करदेते हैं और वे डर नहीं रखते। (56)
_______________________________
☆    अतः यदि युद्ध में तुम उनपर क़ाबू पाओ, तो उनके साथ इस तरह पेश आओ कि उनके पीछेवाले भी भाग खड़े हों, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें। (57)
_______________________________
☆    और यदि तुम्हें किसी क़ौम से विश्वासघात की आशंका हो, तो तुम भी उसी प्रकार ऐसे लोगों के साथ हुई संधि को खुल्लम-खुल्ला उनके आगे फेंक दो। निश्चय ही अल्लाह को विश्वासघात करनेवाले प्रिय नहीं। (58)
_______________________________
☆    इनकार करनेवाले यह न समझेंकि वे आगे निकल गए। वे क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते। (59)
_______________________________
☆    और जो भी तुमसे हो सके, उनके लिए बल और बँधे घोड़े तैयार रखो, ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं और अपने शत्रुओं और इनके अतिरिक्त उन दूसरे लोगों को भी भयभीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते। अल्लाह उनको जानता है और अल्लाह के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा और तुम्हारे साथ कदापि अन्याय न होगा। (60)
_______________________________
☆     और यदि वे संधि और सलामती की ओर झुकें तो तुम भी इसके लिए झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो। निस्संदेह, वह सब कुछ सुनता, जानता है। (61)
_______________________________
☆    और यदि वे यह चाहें कि तुम्हें धोखा दें तो तुम्हारे लिए अल्लाह काफ़ी है। वही तो है जिसने तुम्हें अपनी सहायता से और मोमिनों केद्वारा शक्ति प्रदान की। (62)
_______________________________
☆    और उनके दिल आपस में एक-दूसरे से जोड़ दिए। यदि तुम धरती में जो कुछ है, सब ख़र्च कर डालते तो भी उनके दिलों को परस्पर जोड़ न सकते, किन्तु अल्लाह ने उन्हें परस्पर जोड़ दिया। निश्चय ही वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है। (63)
_______________________________
☆     ऐ नबी! तुम्हारे लिए अल्लाह और तुम्हारे ईमानवालेअनुयायी ही काफ़ी हैं। (64)
_______________________________
☆   ऐ नबी! मोमिनों को जिहाद परउभारो। यदि तुम्हारे बीस आदमी जमे होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुममें से ऐसे सौ होंगे तो वे इनकार करनेवालों में से एक हज़ार पर प्रभावी होंगे, क्योंकि वे नासमझ लोग हैं। (65)
_______________________________
☆     अब अल्लाह ने तुम्हारा बोझहल्का कर दिया और उसे मालूम हुआ कि तुममें कुछ कमज़ोरी है। तो यदि तुम्हारे सौ आदमी जमे रहनेवाले होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी रहेंगे और यदि तुममें से ऐसे हज़ार होंगे तो अल्लाह के हुक्म से वे दो हज़ार पर प्रभावी रहेंगे। अल्लाह तो उन्हीं लोगों के साथ है जो जमे रहते हैं। (66)
_______________________________
☆   किसी नबी के लिए यह उचित नहीं कि उसके पास क़ैदी हों यहाँ तक कि वह धरती में रक्तपात करे। तुम लोग संसार की सामग्री चाहते हो, जबकि अल्लाह आख़िरत चाहता है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।(67)
_______________________________
☆     यदि अल्लाह का लिखा पहले से मौजूद न होता, तो जो कुछ नीति तुमने अपनाई है उसपर तुम्हें कोई बड़ी यातना आ लेती। (68)
_______________________________
☆    अतः जो कुछ ग़नीमत का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है। (69)
_______________________________
☆     ऐ नबी! जो क़ैदी तुम्हारे क़ब्ज़े में हैं, उनसे कह दो,"यदि अल्लाह ने यह जान लिया कि तुम्हारे दिलों में कुछ भलाई है तो वह तुम्हें उससे कहीं उत्तम प्रदान करेगा, जो तुम से छिन गया है और तुम्हें क्षमा कर देगा। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।" (70)
_______________________________
☆     किन्तु यदि वे तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहेंगे, तो इससे पहले वे अल्लाह के साथ विश्वासघात कर चुके हैं। तो उसने तुम्हें उनपर अधिकार दे दिया। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ा तत्वदर्शी है। (71)
_______________________________
☆     जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद कियाऔर जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की, वही लोग परस्पर एक-दूसरे के संरक्षक मित्र हैं। रहे वे लोग जो ईमान लाए, किन्तु उन्होंने हिजरत नहीं की, उनसे तुम्हारासंरक्षण और मित्रता का कोई सम्बन्ध नहीं है, जब तक कि वे हिजरत न करें, किन्तु यदि वे धर्म के मामले में तुमसे सहायता माँगें तो तुमपर अनिवार्य है कि सहायता करो, सिवाय इसके कि सहायता किसी ऐसी क़ौम के मुक़ाबले में हो जिससे तुम्हारी कोई संधि हो। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे देखता है। (72)
_______________________________
☆    जो इनकार करनेवाले लोग हैं, वे आपस में एक-दूसरे के मित्र और सहायक हैं। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो धरती में फ़ितना और बड़ा फ़साद फैलेगा। (73)
_______________________________
☆    और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की वही सच्चे मोमिनहैं। उनके लिए क्षमा और सम्मानित - उत्तम आजीविका है।(74)
_______________________________
☆     और जो लोग बाद में ईमान लाएऔर उन्होंने हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया तो ऐसे लोग भी तुम में हीसे हैं। किन्तु अल्लाह की किताब मे ख़ून के रिश्तेदार एक-दूसरे के ज़्यादा हक़दार हैं। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है। (75)
●═══════════════════✒
www.achhiblog.blogspot.in
« सूरह (अध्याय ) « Go To
पिछला / अगला (अध्याय)
Next / Privew

Currently have 0 comment plz:


Leave a Reply

© 2010 www.achhiblog.blogspot.in |Blogger Author BloggerTheme
powered by Blogger | WordPress by camelgraph | Converted by BloggerTheme.