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3.1 आले-इमरान    [ कुल आयतें - 200 ]

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सुरु अल्लाह के नाम से
जो बड़ा कृपाशील अत्यन्त दयावान है।
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●═══════════════════✒
☆   अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰(1)
_______________________________
☆    अल्लाह ही पूज्य है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। वह जीवन्त है, सबको सँभालने और क़ायम रखनेवाला। (2)
_______________________________
☆    उसने तुमपर हक़ के साथ किताब उतारी जो पहले की (किताबों की) पुष्टि करती है, और उसने तौरात और इंजील उतारी; (3)
_______________________________
☆    इससे पहले लोगों के मार्गदर्शन के लिए और उसने कसौटी भी उतारी। निस्संदेह जिन लोगों ने अल्लाह की आयतोंका इनकार किया उनके लिए कठोर यातना है और अल्लाह प्रभुत्वशाली भी है और (बुराईका) बदला लेनेवाला भी। (4)
_______________________________
☆    निस्संदेह अल्लाह से कोई चीज़ न धरती में छिपी है और न आकाश में। (5)
_______________________________
☆    वही है जो गर्भाशयों में, जैसा चाहता है, तुम्हें रूप देता है। उस प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी के अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं।(6)
_______________________________
☆   वही है जिसने तुमपर अपनी ओर से किताब उतारी, वे सुदृढ़ आयतें हैं जो किताबों का मूल और सारगर्भित रूप हैं और दूसरी (किताबें) सन्दिग्ध, तो जिन लोगों के दिलों में टेढ़ है वे फ़ितने (गुमराही) की तलाश और उसके आशय और परिणाम की चाह में उसका अनुसरण करते हैं जो सन्दिग्ध है। जबकि उनका परिणाम बस अल्लाह ही जानता है, और वे जो ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं, "हम उसपर ईमान लाए, जो हर एक हमारेरब ही की ओर से है।" और चेतते तो केवल वही हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं। (7)
_______________________________
☆     हमारे रब! जब तू हमें सीधे मार्ग पर लगा चुका है तो इसके पश्चात हमारे दिलों में टेढ़ न पैदा कर और हमें अपने पास सेदयालुता प्रदान कर। निश्चय ही तू बड़ा दाता है। (8)
_______________________________
☆     हमारे रब! तू लोगों को एक दिन इकट्ठा करने वाला है, जिसमें कोई संदेह नहीं। निस्सन्देह अल्लाह अपने वचन के विरुद्ध जाने वाला नहीं है। (9)
_______________________________
☆    जिन लोगों ने अल्लाह के मुक़ाबले में इनकार की नीति अपनाई है, न तो उनके माल उनके कुछ काम आएँगे और न उनकी संतान ही। और वही हैं जो आग (जहन्नम) का ईधन बनकर रहेंगे। (10)
_______________________________
☆     जैसे फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों का हाल हुआ। उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया तो अल्लाह ने उन्हें उनके गुनाहों पर पकड़ लिया। और अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है। (11)
_______________________________
☆    इनकार करनेवालों से कह दो,"शीघ्र ही तुम पराभूत होगे और जहन्नम की ओर हाँके जाओगे। औरवह क्या ही बुरा ठिकाना है।" (12)
_______________________________
☆    तुम्हारे लिए उन दोनों गरोहों में एक निशानी है जो (बद्र की) लड़ाई में एक-दूसरे के मुक़ाबिल हुए। एक गरोह अल्लाह के मार्ग में लड़ रहा था, जबकि दूसरा विधर्मी था। ये अपनी आँखों से देख रहे थे कि वे उनसे दुगने हैं। अल्लाहअपनी सहायता से जिसे चाहता है, शक्ति प्रदान करता है। दृष्टिवान लोगों के लिए इसमें बड़ी शिक्षा-सामग्री है। (13)
_______________________________
☆    मनुष्यों को चाहत की चीज़ोंसे प्रेम शोभायमान प्रतीत होता है कि वे स्त्रियाँ, बेटे, सोने-चाँदी के ढेर और निशान लगे (चुने हुए) घोड़े हैं और चौपाए और खेती। यह सब सांसारिक जीवन की सामग्री है और अल्लाह के पास ही अच्छा ठिकाना है। (14)
_______________________________
☆     कहो, "क्या मैं तुम्हें इनसे उत्तम चीज़ का पता दूँ?" जो लोग अल्लाह का डर रखेंगे उनके लिए उनके रब के पास बाग़ हैं, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। वहाँ पाक-साफ़ जोड़े होंगे और अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त होगी। और अल्लाह अपने बन्दों पर नज़र रखता है। (15)
_______________________________
☆     ये वे लोग हैं जो कहते हैं,"हमारे रब हम ईमान लाए हैं। अतः हमारे गुनाहों को क्षमा कर दे और हमें आग (जहन्नम) की यातना से बचा ले।" (16)
_______________________________
☆    ये लोग धैर्य से काम लेनेवाले, सत्यवान और अत्यन्त आज्ञाकारी हैं, ये (अल्लाह के मार्ग में) ख़र्च करते और रात की अंतिम घड़ियोंमें क्षमा की प्रार्थनाएँ करते हैं। (17)
_______________________________
☆     अल्लाह ने गवाही दी कि उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; और फ़रिश्तों ने और उन लोगों ने भी जो न्याय और संतुलन स्थापित करनेवाली एक सत्ता को जानते हैं। उस प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी के सिवा कोई पूज्य नहीं। (18)
_______________________________
☆    दीन (धर्म) तो अल्लाह की नज़र में इस्लाम ही है। जिन्हें किताब दी गई थी, उन्होंने तो इसमें इसके पश्चात विभेद किया कि ज्ञान उनके पास आ चुका था। ऐसा उन्होंने परस्पर दुराग्रह केकारण किया। जो अल्लाह की आयतों का इनकार करेगा तो अल्लाह भी जल्द हिसाब लेनेवाला है। (19)
_______________________________
☆   अब यदि वे तुमसे झगड़ें तो कह दो, "मैंने और मेरे अनुयायियों ने तो अपने आपको अल्लाह के हवाले कर दिया है।" और जिन्हें किताब मिली थी और जिनके पास किताब नहीं है, उनसे कहो, "क्या तुम भी इस्लामको अपनाते हो?" यदि वे इस्लाम को अंगीकार कर लें तो सीधा मार्ग पा गए। और यदि मुँह मोड़ें तो तुमपर केवल (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। और अल्लाह स्वयं बन्दों को देख रहा है। (20)
_______________________________
☆    जो लोग अल्लाह की आयतों का इनकार करें और नबियों को नाहक़ क़त्ल करने के दर पे हों, और उन लोगों को क़त्ल करेंजो न्याय का पालन करने को कहें, उनको दुखद यातना की मंगल सूचना दे दो। (21)
_______________________________
☆    यही लोग हैं, जिनके कर्म दुनिया और आख़िरत में उनके लिए वबाल बने, और उनका सहायक कोई भी नहीं। (22)
_______________________________
☆    क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्हें सौभाग्य, यानी किताब प्रदान की गई? उन्हें अल्लाह की किताब की ओरबुलाया जाता है कि वह उनके बीच निर्णय करे, फिर भी उनका एक गरोह (उसकी) उपेक्षा करते हुए मुँह फेर लेता है। (23)
_______________________________
☆   यह इसलिए कि वे कहते हैं,"आग हमें नहीं छू सकती। हाँ, कुछ गिने-चुने दिनों (के कष्टों) की बात और है।" उनकी मनघड़ंत बातों ने, जो वे घड़ते रहे हैं, उन्हें अपने दीन के बारे में धोखे में डाल रखा है।(24)
_______________________________
☆    फिर क्या हाल होगा, जब हम उन्हें उस दिन इकट्ठा करेंगे,जिसके आने में कोई संदेह नहींऔर प्रत्येक व्यक्ति को, जो कुछ उसने कमाया होगा, पूरा-पूरा मिल जाएगा; और उनके साथ कोई अन्याय न होगा। (25)
_______________________________
☆    कहो, "ऐ अल्लाह, राज्य के स्वामी! तू जिसे चाहे राज्य दे और जिससे चाहे राज्य छीन ले, और जिसे चाहे इज़्ज़त (प्रभुत्व) प्रदान करे और जिसको चाहे अपमानित कर दे। तेरे ही हाथ में भलाई है। निस्संदेह तुझे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।" (26)
_______________________________
☆    "तू रात को दिन में पिरोता है और दिन को रात में पिरोता है। तू निर्जीव से सजीव को निकालता है और सजीव से निर्जीव को निकालता है, और जिसे चाहता है बेहिसाब देता है।" (27)
_______________________________
☆    ईमानवालों को चाहिए कि वे ईमानवालों से हटकर इनकार करनेवालों को अपना मित्र (राज़दार) न बनाएँ, और जो ऐसा करेगा उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं, क्योंकि उससे सम्बद्ध यही बात है कि तुम उनसे बचो, जिस प्रकार वे तुमसे बचते हैं। और अल्लाह तुम्हें अपने आपसे डराता है, और अल्लाह ही की ओर लौटना है। (28)
_______________________________
☆    कह दो, "यदि तुम अपने दिलोंकी बात छिपाओ या उसे प्रकट करो, प्रत्येक दशा में अल्लाहउसे जान लेगा। और वह उसे भी जानता है, जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। और अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।" (29)
_______________________________
☆    जिस दिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी की हुई भलाई और अपनी की हुई बुराई को सामने मौजूद पाएगा, वह कामना करेगा कि काश,उसके और उस दिन के बीच बहुत दूर का फ़ासला होता! और अल्लाह तुम्हें अपना भय दिलाता है, और वह अपने बन्दों के लिए अत्यन्त करुणामय है। (30)
_______________________________
☆     कह दो, "यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरणकरो, अल्लाह भी तुमसे प्रेम करेगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।" (31)
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☆    कह दो, "अल्लाह और रसूल का आज्ञापालन करो।" फिर यदि वे मुँह मोड़ें तो अल्लाह भी इनकार करनेवालों से प्रेम नहीं करता। (32)
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☆     अल्लाह ने आदम, नूह, इबराहीम की सन्तान और इमरान की सन्तान को संसार की अपेक्षा प्राथमिकता देकर चुना। (33)
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☆    एक नस्ल के रूप में, उसमें से एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से पैदा हुई। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है। (34)
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☆    याद करो जब इमरान की स्त्री ने कहा, "मेरे रब! जो बच्चा मेरे पेट में है उसे मैंने हर चीज़ से छुड़ाकर भेंटस्वरूप तुझे अर्पित किया। अतः तू उसे मेरी ओर से स्वीकार कर। निस्संदेह तू सब कुछ सुनता, जानता है।" (35)
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☆    फिर जब उसके यहाँ बच्ची पैदा हुई तो उसने कहा, "मेरे रब! मेरे यहाँ तो लड़की पैदा हुई है।" - अल्लाह तो जानता हीथा जो कुछ उसके यहाँ पैदा हुआ था। और लड़का उस लड़की की तरह नहीं हो सकता - "और मैंने उसकानाम मरयम रखा है। और मैं उसे और उसकी सन्तान को तिरस्कृत शैतान (के उपद्रव) से सुरक्षित रखने के लिए तेरी शरण में देती हूँ।" (36)
_______________________________
☆    अतः उसके रब ने उसका अच्छी स्वीकृति के साथ स्वागत किया और उत्तम रूप में उसे परवान चढ़ाया; और ज़क़रीय्या को उसका संरक्षक बनाया। जब कभी ज़क़रीय्या उसके पास मेहराब (इबादतगाह) में जाता तो उसके पास कुछ रोज़ी पाता। उसने कहा, "ऐ मरयम! ये चीज़ें तुझे कहाँ से मिलती हैं?" उसने कहा,"यह अल्लाह के पास से है।" निस्संदेह अल्लाह जिसे चाहताहै, बेहिसाब रोज़ी देता है।(37)
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☆     वहीं ज़क़रीय्या ने अपने रब को पुकारा। कहा, "मेरे रब! मुझे तू अपने पास से अच्छी सन्तान (अनुयायी) प्रदान कर। तू ही प्रार्थना का सुननेवाला है।" (38)
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☆     तो फ़रिश्तों ने उसे आवाज़दी, जबकि वह मेहराब में खड़ा नमाज़ पढ़ रहा था, "अल्लाह, तुझे यह्या की शुभ-सूचना देताहै, जो अल्लाह के एक कलिमे की पुष्टि करनेवाला, सरदार, अत्यन्त संयमी और अच्छे लोगों में से एक नबी होगा।" (39)
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☆   उसने कहा, "मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे पैदा होगा, जबकि मुझे बुढ़ापा आ गया है और मेरी पत्नी बाँझ है?" कहा,"इसी प्रकार अल्लाह जो चाहता है, करता है।"(40)
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☆    उसने कहा, "मेरे रब! मेरे लिए कोई आदेश निश्चित कर दे।" कहा, "तुम्हारे लिए आदेश यह हैकि तुम लोगों से तीन दिन तक संकेत के सिवा कोई बातचीत न करो। अपने रब को बहुत अधिक याद करो और सायंकाल और प्रातःसमय उसकी तसबीह (महिमागान) करते रहो।" (41)
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☆   और जब फ़रिश्तों ने कहा, "ऐमरयम! अल्लाह ने तुझे चुन लिया और तुझे पवित्रता प्रदान की और तुझे संसार की स्त्रियों के मुक़ाबले में चुन लिया। (42)
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☆   "ऐ मरयम! पूरी निष्ठा के साथ अपने रब की आज्ञा का पालन करती रह, और सजदा कर और झुकनेवालों के साथ तू भी झुकती रह।" (43)
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☆    यह परोक्ष की सूचनाओं में से है, जिसकी वह्य हम तुम्हारी ओर कर रहे हैं। तुम तो उस समय उनके पास नहीं थे, जब वे अपनी क़लमों को फेंक रहे थे कि उनमें कौन मरयम का संरक्षक बने और न उस समय तुम उनके पास थे, जब वे आपस में झगड़ रहे थे। (44)
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☆    ओर याद करो जब फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ मरयम! अल्लाह तुझे अपने एक कलिमे (बात) की शुभ-सूचना देता है जिसका नाम मसीह, मरयम का बेटा, ईसा होगा।वह दुनिया और आख़िरत मे आबरूवाला होगा और अल्लाह के निकटवर्ती लोगों में से होगा। (45)
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☆    वह लोगों से पालने में भी बात करेगा और बड़ी उम्र को पहुँचकर भी। और वह नेक व्यक्ति होगा। - (46)
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☆   वह बोली, "मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कहाँ से होगा, जबकि मुझे किसी आदमी ने छुआ तक नहीं?" कहा, "ऐसा ही होगा, अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है। जब वह किसी कार्य का निर्णय करता है तो उसको बस यही कहता है 'हो जा' तो वह हो जाता है।(47)
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☆  और उसको किताब और हिकमत, यानी तौरात और इंजील का ज्ञानदेगा।(48)
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☆    और उसे इसराईल की संतान की ओर रसूल बनाकर भेजेगा। (वह कहेगा) कि मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक निशानी लेकर आया हूँ कि मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से पक्षी के रूप जैसी आकृति बनाता हूँ, फिर उसमें फूँक मारता हूँ, तो वह अल्लाह के आदेश से उड़ने लगती है। और मैं अल्लाह के आदेश से अंधे और कोढ़ी को अच्छा कर देता हूँ और मुर्दे को जीवित कर देता हूँ। और मैं तुम्हें बतादेता हूँ जो कुछ तुम खाते हो और जो कुछ अपने घरों में इकट्ठा करके रखते हो। निस्संदेह इसमें तुम्हारे लिए एक निशानी है, यदि तुम माननेवाले हो। (49)
_______________________________
☆   और मैं तौरात की, जो मेरे आगे है, पुष्टि करता हूँ और इसलिए आया हूँ कि तुम्हारे लिए कुछ उन चीज़ों को हलाल कर दूँ जो तुम्हारे लिए हराम थीं। और मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक निशानी लेकर आया हूँ। अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी आज्ञा का पालन करो।(50)
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☆   निस्संदेह अल्लाह मेरा भी रब है और तुम्हारा रब भी, अतः तुम उसी की बन्दगी करो। यही सीधा मार्ग है।"(51)
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☆     फिर जब ईसा को उनके अविश्वास और इनकार का आभास हुआ तो उसने कहा, "कौन अल्लाह की ओर बढ़ने में मेरा सहायक होता है?" हवारियों (साथियों) ने कहा, "हम अल्लाह के सहायक हैं। हम अल्लाह पर ईमान लाए और गवाह रहिए कि हम मुस्लिम हैं।" (52)
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☆     "हमारे रब! तूने जो कुछ उतारा है, हम उसपर ईमान लाए औरहम ने इस रसूल का अनुसरण स्वीकार किया। अतः तू हमें गवाही देनेवालों में लिख ले।"(53)
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☆    और वे गुप्त चाल चले तो अल्लाह ने भी उसका तोड़ किया और अल्लाह उत्तम तोड़ करनेवाला है। (54)
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☆   जब अल्लाह ने कहा, "ऐ ईसा! मैं तुझे अपने क़ब्ज़े में ले लूँगा और तुझे अपनी ओर उठा लूँगा और अविश्वासियों (की कुचेष्टाओं) से तुझे पाक कर दूँगा और तेरे अनुयायियों को क़ियामत के दिन तक उन लोगों के ऊपर रखूँगा, जिन्होंने इनकार किया। फिर मेरी ओर तुम्हें लौटना है। फिर मैं तुम्हारे बीच उन चीज़ों का फ़ैसला कर दूँगा, जिनके विषय में तुम विभेद करते रहे हो।" (55)
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☆    "तो जिन लोगों ने इनकार की नीति अपनाई, उन्हें दुनिया औरआख़िरत में कड़ी यातना दूँगा। उनका कोई सहायक न होगा।" (56)
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☆   रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें वह उनका पूरा-पूरा बदला देगा। अल्लाह अत्याचारियों से प्रेम नहीं करता।(57)
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☆    ये आयतें है और हिकमत (तत्वज्ञान) से परिपूर्ण अनुस्मारक, जो हम तुम्हें सुना रहे हैं। (58)
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☆    निस्संदेह अल्लाह की दृष्टि में ईसा की मिसाल आदम जैसी है कि उसे मिट्टी से बनाया, फिर उससे कहा, "हो जा", तो वह हो जाता है। (59)
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☆    यह हक़ तुम्हारे रब की ओर से है, तो तुम संदेह में न पड़ना। (60)
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☆    अब इसके पश्चात कि तुम्हारे पास ज्ञान आ चुका है, कोई तुमसे इस विषय में कुतर्क करे तो कह दो, "आओ, हम अपने बेटों को बुला लें और तुम भी अपने बेटों को बुला लो,और हम अपनी स्त्रियों को बुलालें और तुम भी अपनी स्त्रियोंको बुला लो, और हम अपने को और तुम अपने को ले आओ, फिर मिलकर प्रार्थना करें और झूठों पर अल्लाह की लानत भेजें।" (61)
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☆    निस्संदेह यही सच्चा बयान है और अल्लाह के अतिरिक्त कोईपूज्य नहीं। और अल्लाह ही प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।(62)
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☆     फिर यदि वे लोग मुँह मोड़ें तो अल्लाह फ़सादियों को भली-भाँति जानता है। (63)
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☆    कहो, "ऐ किताबवालो! आओ एक ऐसी बात की ओर जिसे हमारे और तुम्हारे बीच समान मान्यता प्राप्त है; यह कि हम अल्लाह के अतिरिक्त किसी की बन्दगी नकरें और न उसके साथ किसी चीज़ को साझी ठहराएँ और न परस्पर हममें से कोई एक-दूसरे को अल्लाह से हटकर रब बनाए।" फिर यदि वे मुँह मोड़ें तो कह दो,"गवाह रहो, हम तो मुस्लिम (आज्ञाकारी) हैं।" (64)
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☆     "ऐ किताबवालो! तुम इबराहीमके विषय में हमसे क्यों झगड़ते हो? जबकि तौरात और इंजील तो उसके पश्चात उतारी गई हैं, तो क्या तुम समझ से काम नहीं लेते? (65)
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☆   ये तुम लोग हो कि उसके विषय में तो वाद-विवाद कर चुके जिसका तुम्हें कुछ ज्ञान था। अब उसके विषय में क्यों वाद-विवाद करते हो, जिसके विषय में तुम्हें कुछ भी ज्ञान नहीं? अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते।"(66)
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☆    इबराहीम न यहूदी था और न ईसाई, बल्कि वह तो एक ओर का होकर रहनेवाला मुस्लिम (आज्ञाकारी) था। वह कदापि मुशरिकों में से न था। (67)
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☆    निस्संदेह इबराहीम से सबसे अधिक निकटता का सम्बन्ध रखनेवाले वे लोग हैं जिन्होंने उसका अनुसरण किया, और यह नबी और ईमानवाले लोग। और अल्लाह ईमानवालों को समर्थक एवं सहायक है। (68)
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☆     किताबवालों में से एक गरोहके लोगों की कामना है कि काश! वे तुम्हें पथभ्रष्ट कर सकें,जबकि वे केवल अपने-आपको पथभ्रष्ट कर रहे हैं।! किन्तुउन्हें इसका एहसास नहीं। (69)
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☆   ऐ किताबवालो! तुम अल्लाह की आयतों का इनकार क्यों करतेहो, जबकि तुम स्वयं गवाह हो? (70)
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☆     ऐ किताबवालो! सत्य को असत्य के साथ क्यों गड्ड-मड्डकरते और जानते-बूझते सत्य को छिपाते हो? (71)
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☆    किताबवालों में से एक गरोहकहता है, "ईमानवालों पर जो कुछउतरा है, उस पर प्रातःकाल ईमान लाओ और संध्या समय इनकारकर दो, ताकि वे फिर जाएँ। (72)
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☆   और तुम अपने धर्म के अनुयायियों के अतिरिक्त किसीपर विश्वास न करो। कह दो, 'वास्तविक मार्गदर्शन तो अल्लाह का मार्गदर्शन है' - किकहीं जो चीज़ तुम्हें प्राप्त है उस जैसी चीज़ किसी और को प्राप्त हो जाए, या वे तुम्हारे रब की नज़र में तुम्हारे समान हो जाएँ।" कह दो, "बढ़-चढ़कर प्रदान करना तो अल्लाह के हाथ में है, जिसेचाहता है प्रदान करता है। और अल्लाह बड़ी समाईवाला, सब कुछजाननेवाला है।(73)
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☆   वह जिसे चाहता है अपनी रहमत (दयालुता) के लिए ख़ास करलेता है। और अल्लाह बड़ी उदारता दर्शानेवाला है।" (74)
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☆   और किताबवालों में कोई तो ऐसा है कि यदि तुम उसके पास धन-दौलत का एक ढेर भी अमानत रखदो तो वह उसे तुम्हें लौटा देगा। और उनमें कोई ऐसा है कि यदि तुम एक दीनार भी उसकी अमानत में रख दो, तो जब तक कि तुम उसके सिर पर सवार न हो, वह उसे तुम्हें अदा नहीं करेगा। यह इसलिए कि वे कहते हैं, "उन लोगों के विषय में जो किताबवाले नहीं हैं हमारी कोई पकड़ नहीं।" और वे जानते-बूझते अल्लाह पर झूठ मढ़ते हैं। (75)
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☆    क्यों नहीं, जो कोई अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेगा और डर रखेगा, तो अल्लाह भी डर रखनेवालों से प्रेम करता है। (76)
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☆    रहे वे लोग जो अल्लाह की प्रतिज्ञा और अपनी क़समों का थोड़े मूल्य पर सौदा करते हैं, उनका आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं। अल्लाह न तो उनसे बात करेगा और न क़ियामत के दिन उनकी ओर देखेगा, और न ही उन्हें निखारेगा। उनके लिए तो दुखद यातना है। (77)
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☆    उनमें कुछ लोग ऐसे हैं जो किताब पढ़ते हुए अपनी ज़बानों का इस प्रकार उलट-फेरकरते हैं कि तुम समझो कि वह किताब ही में से है, जबकि वह किताब में से नहीं होता। और वे कहते हैं, "यह अल्लाह की ओर से है।" जबकि वह अल्लाह की ओर से नहीं होता। और वे जानते-बूझते झूठ गढ़कर अल्लाह पर थोपते हैं। (78)
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☆    किसी मनुष्य के लिए यह सम्भव न था कि अल्लाह उसे किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता)और पैग़म्बरी प्रदान करे और वह लोगों से कहने लगे, "तुम अल्लाह को छोड़कर मेरे उपासक बनो।" बल्कि वह तो यही कहेगा कि, "तुम ईश-भयवाले (रबवाले) बनो, इसलिए कि तुम किताब की शिक्षा देते हो और इसलिए कि तुम स्वयं भी पढ़ते हो।" (79)
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☆    और न वह तुम्हें इस बात का हुक्म देगा कि तुम फ़रिश्तों और नबियों को अपना रब बना लो। क्या वह तुम्हें अधर्म का हुक्म देगा, जबकि तुम (उसके) आज्ञाकारी हो? (80)
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☆    और याद करो जब अल्लाह ने नबियों के सम्बन्ध में वचन लिया था, "मैंने तुम्हें जो कुछ किताब और हिकमत प्रदान की, इसके पश्चात तुम्हारे पासकोई रसूल उसकी पुष्टि करता हुआ आए जो तुम्हारे पास मौजूदहै, तो तुम अवश्य उस पर ईमान लाओगे और निश्चय ही उसकी सहायता करोगे।" कहा, "क्या तुमने इक़रार किया? और इसपर मेरी ओर से डाली हुई ज़िम्मेदारी को बोझ उठाया?" उन्होंने कहा, "हमने इक़रार किया।" कहा, "अच्छा तो गवाह रहो और मैं भी तुम्हारे साथ गवाह हूँ।" (81)
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☆   फिर इसके बाद जो फिर गए, तो ऐसे ही लोग अवज्ञाकारी हैं। (82)
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☆    अब क्या इन लोगों को अल्लाह के दीन (धर्म) के सिवा किसी और दीन की तलब है, हालाँकि आकाशों और धरती में जो कोई भी है, स्वेच्छापूर्वकया विवश होकर उसी के आगे झुका हुआ है। और उसी की ओर सबको लौटना है? (83)
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☆   कहो, "हम तो अल्लाह पर और उसचीज़ पर ईमान लाए जो हम पर उतरी है, और जो इबराहीम, इसमाईल, इसहाक़ और याकूब़ और उनकी सन्तान पर उतरी उसपर भी, और जो मूसा और ईसा और दूसरे नबियों को उनके रब की ओर से प्रदान हुई (उसपर भी हम ईमान रखते हैं) । हम उनमें से किसी को उस सम्बन्ध से अलग नहीं करते जो उनके बीच पाया जाता है, और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं।"(84)
_______________________________
☆   जो इस्लाम के अतिरिक्त कोईऔर दीन (धर्म) तलब करेगा तो उसकी ओर से कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा। और आख़िरत में वहघाटा उठानेवालों में से होगा। (85)
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☆    अल्लाह उन लोगों को कैसे मार्ग दिखाएगा, जिन्होंने अपने ईमान के पश्चात अधर्म औरइनकार की नीति अपनाई, जबकि वे स्वयं इस बात की गवाही दे चुके हैं कि यह रसूल सच्चा है और उनके पास स्पष्ट निशानियाँ भी आ चुकी हैं? अल्लाह अत्याचारी लोगों को मार्ग नहीं दिखाया करता। (86)
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☆   उन लोगों का बदला यही है किउनपर अल्लाह और फ़रिश्तों और सारे मनुष्यों की लानत है। (87)
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☆    इसी दशा में वे सदैव रहेंगे, न उनकी यातना हल्की होगी और न उन्हें मुहलत ही दी जाएगी। (88)
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☆    हाँ, जिन लोगों ने इसके पश्चात तौबा कर ली और अपनी नीति को सुधार लिया तो निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है। (89)
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☆     रहे वे लोग जिन्होंने अपनेईमान के पश्चात इनकार किया औरअपने इनकार में बढ़ते ही गए, उनकी तौबा कदापि स्वीकार न होगी। वास्तव में वही पथभ्रष्ट हैं। (90)
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☆    निस्संदेह जिन लोगों ने इनकार किया और इनकार ही की दशा में मरे, तो उनमें किसी नेधरती के बराबर सोना भी यदि उसने प्राण-मुक्ति के लिए दिया हो तो कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा। ऐसे लोगों के लिए दुखद यातना है और उनका कोई सहायक न होगा।(91)
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☆    तुम नेकी और वफ़ादारी के दर्जे को नहीं पहुँच सकते, जब तक कि उन चीज़ों को (अल्लाह के मार्ग में) ख़र्च न करो, जो तुम्हें प्रिय हैं। और जो चीज़ भी तुम ख़र्च करोगे, निश्चय ही अल्लाह को उसका ज्ञान होगा। (92)
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☆    खाने की सारी चीज़ें इसराईलकी संतान के लिए हलाल थीं, सिवाय उन चीज़ों के जिन्हें तौरात के उतरने से पहले इसराईल ने स्वयं अपने लिए हराम कर लिया था। कहो, "यदि तुम सच्चे हो तो तौरात लाओ और उसे पढ़ो।" (93)
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☆    अब इसके पश्चात भी जो व्यक्ति झूठी बातें अल्लाह से जोड़े, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी हैं। (94)
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☆    कहो, "अल्लाह ने सच कहा है; अतः इबराहीम के तरीक़े का अनुसरण करो, जो हर ओर से कटकर एक का हो गया था और मुशरिकों में से न था। (95)
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☆   निस्ंसदेह इबादत के लिए पहला घर जो 'मानव के लिए' बनायागया वही है जो मक्का में है, बरकतवाला और सर्वथा मार्गदर्शन, संसारवालों के लिए। (96)
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☆   उसमें स्पष्ट निशानियाँ हैं, वह इबराहीम का स्थल है। और जिसने उसमें प्रवेश किया, वह निश्चिन्त हो गया। लोगों पर अल्लाह का हक़ है कि जिसको वहाँ तक पहुँचने की सामर्थ्य प्राप्त हो, वह इस घर का हज करे, और जिसने इनकार किया तो (इस इनकार से अल्लाह का कुछ नहीं बिगड़ता) अल्लाह तो सारेसंसार से निरपेक्ष है।" (97)
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☆    कहो, "ऐ किताबवालो! तुम अल्लाह की आयतों का इनकार क्यों करते हो, जबकि जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह की दृष्टि में है?" (98)
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☆    कहो, "ऐ किताबवालो! तुम ईमान लानेवालों को अल्लाह के मार्ग से क्यों रोकते हो, तुम्हें उसमें किसी टेढ़ की तलाश रहती है, जबकि तुम भली-भाँति वास्तविकता से अवगत हो और जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।" (99)
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☆    ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुमने उनके किसी गरोह की बात मान ली, जिन्हें किताब मिली थी, तो वे तुम्हारे ईमान लाने के पश्चात फिर तुम्हें अधर्मी बना देंगे। (100)
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