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12. यूसुफ़    [ कुल आयतें - 111]

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सुरु अल्लाह के नाम से
जो बड़ा कृपाशील अत्यन्त दयावान है।
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●═══════════════════✒
☆   अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। ये स्पष्ट किताब की आयतें हैं। (1)
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☆     हमने इसे अरबी क़ुरआन के रूप में उतारा है, ताकि तुम समझो। (2)
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☆    इस क़ुरआन की तुम्हारी ओर प्रकाशना करके इसके द्वारा हम तुम्हें एक बहुत ही अच्छा बयान सुनाते हैं, यद्यपि इससेपहले तुम बेख़बर थे। (3)
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☆    जब यूसुफ़ ने अपने बाप से कहा, "ऐ मेरे बाप! मैंने स्वप्न में ग्यारह सितारे देखे और सूर्य और चाँद। मैंनेउन्हें देखा कि वे मुझे सजदा कर रहे हैं।" (4)
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☆    उसने कहा, "ऐ मेरे बेटे! अपना स्वप्न अपने भाइयों को मत बताना, अन्यथा वे तेरे विरुद्ध कोई चाल चलेंगे। शैतान तो मनुष्य का खुला हुआ शत्रु है। (5)
_______________________________
☆     और ऐसा ही होगा, तेरा रब तुझे चुन लेगा और तुझे बातों की तथ्य तक पहुँचना सिखाएगा और अपना अनुग्रह तुझपर और याक़ूब के घरवालों पर उसी प्रकार पूरा करेगा, जिस प्रकार इससे पहले वह तेरे पूर्वज इबराहीम और इसहाक़ पर पूरा कर चुका है। निस्संदेह तेरा रब सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है।" (6)
_______________________________
☆    निश्चय ही यूसुफ़ और उसके भाइयों में सवाल करनेवालों के लिए निशानियाँ हैं।(7)
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☆   जबकि उन्होंने कहा,"यूसुफ़ और उसका भाई हमारे बापको हमसे अधिक प्रिय है, हालाँकि हम एक पूरा जत्था हैं। वास्तव में हमारे बाप स्पष्टतः बहक गए हैं। (8)
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☆     यूसुफ़ को मार डालो या उसे किसी भूभाग में फेंक आओ, ताकि तुम्हारे बाप का ध्यान केवल तुम्हारी ही ओर हो जाए। इसके पश्चात तुम फिर नेक बन जाना।" (9)
_______________________________
☆   उनमें से एक बोलनेवाला बोलपड़ा, "यूसुफ़ की हत्या न करो, यदि तुम्हें कुछ करना ही है तो उसे किसी कुएँ की तह में डाल दो। कोई राहगीर उसे उठा लेगा।" (10)
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☆    उन्होंने कहा, "ऐ हमारे बाप! आपको क्या हो गया है कि यूसुफ़ के मामले में आप हमपर भरोसा नहीं करते, हालाँकि हम तो उसके हितैषी हैं? (11)
_______________________________
☆    हमारे साथ कल उसे भेज दीजिए कि वह कुछ चर-चुग और खेलले। उसकी रक्षा के लिए तो हम हैं ही।" (12)
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☆    उसने कहा, "यह बात कि तुम उसे ले जाओ, मुझे दुखी कर देतीहै। कहीं ऐसा न हो कि तुम उसकाध्यान न रख सको और भेड़िया उसे खा जाए।" (13)
_______________________________
☆   वे बोले, "हमारे एक जत्थे के होते हुए भी यदि उसे भेड़िए ने खा लिया, तब तो निश्चय ही हम सब कुछ गँवा बैठे।" (14)
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☆     फिर जब वे उसे ले गए और सभी इस बात पर सहमत हो गए कि उसे एक कुएँ की गहराई में डाल दें (तो उन्होंने वह किया जो करना चाहते थे), और हमने उसकी ओर प्रकाशना की, "तू उन्हें उनके इस कर्म से अवगत कराएगा और वे जानते न होंगे।" (15)
_______________________________
☆   कुछ रात बीते वे रोते हुए अपने बाप के पास आए। (16)
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☆   कहने लगे, "ऐ हमारे बाप! हम परस्पर दौड़ में मुक़ाबला करते हुए दूर चले गए और यूसफ़ को हमने अपने सामान के साथ छोड़ दिया था कि इतने में भेड़िया उसे खा गया। आप तो हमपर विश्वास करेंगे नहीं, यद्यपि हम सच्चे हैं।"(17)
_______________________________
☆    वे उसके कुर्ते पर झूठमूठ का ख़ून लगा लाए थे। उसने कहा,"नहीं, बल्कि तुम्हारे जी ने बहकाकर तुम्हारे लिए एक बात बना दी है। अब धैर्य से काम लेना ही उत्तम है! जो बात तुम बता रहे हो उसमें अल्लाह ही सहायक हो सकता है।" (18)
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☆    एक क़ाफ़िला आया। फिर अपनेपनिहारे को भेजा। उसने अपना डोल ज्यों ही डाला तो पुकार उठा, "अरे! कितनी ख़ुशी की बात है। यह तो एक लड़का है।" उन्होंने उसे व्यापार का माल समझकर छुपा लिया। किन्तु जो कुछ वे कर रहे थे, अल्लाह तो उसे जानता ही था (19)
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☆   उन्होंने उसे सस्ते दाम, गिनती के कुछ दिरहमों में बेचदिया, क्योंकि वे उसके मामले में बेपरवाह थे।(20)
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☆   मिस्र के जिस व्यक्ति ने उसे ख़रीदा, उसने अपनी स्त्रीसे कहा, "इसको अच्छी तरह रखना।बहुत सम्भव है कि यह हमारे काम आए या हम इसे बेटा बना लें।" इस प्रकार हमने उस भूभाग में यूसुफ़ के क़दम जमाने की राह निकाली (ताकि उसे प्रतिष्ठा प्रदान करें) और ताकि मामलों और बातों के परिणाम से हम उसे अवगत कराएँ।अल्लाह तो अपना काम करके रहताहै, किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं। (21)
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☆    और जब वह अपनी जवानी को पहुँचा तो हमने उसे निर्णय-शक्ति और ज्ञान प्रदान किया। उत्तमकार लोगों को हम इसी प्रकार बदला देते हैं। (22)
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☆    जिस स्त्री के घर में वह रहता था, वह उस पर डोरे डालने लगी। उसने दरवाज़े बन्द कर दिए और कहने लगी, "लो, आ जाओ!" उसने कहा, "अल्लाह की पनाह! मेरे रब ने मुझे अच्छा स्थान दिया है। अत्याचारी कभी सफल नहीं होते।" (23)
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☆    उसने उसका इरादा कर लिया था। यदि वह अपने रब का स्पष्ट प्रमाण न देख लेता तो वह भी उसका इरादा कर लेता। ऐसा इसलिए हुआ ताकि हम बुराई और अश्लीलता को उससे दूर रखें। निस्संदेह वह हमारे चुने हुए बन्दों में से था। (24)
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☆    वे दोनों दरवाज़े की ओर झपटे और उस स्त्री ने उसका कुर्ता पीछे से फाड़ डाला। दरवाज़े पर दोनों ने उस स्त्री के पति को उपस्थित पाया। वह बोली, "जो कोई तुम्हारी घरवाली के साथ बुरा इरादा करे, उसका बदला इसके सिवा और क्या होगा कि उसे बन्दी बनाया जाए या फिर कोई दुखद यातना दी जाए?" (25)
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☆    उसने कहा, "यही मुझपर डोरे डाल रही थी।" उस स्त्री के लोगों में से एक गवाह ने गवाही दी, "यदि इसका कुर्ता आगे से फटा है तो यह सच्ची है और यह झूठा है, (26)
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☆   और यदि उसका कुर्ता पीछे से फटा है तो यह झूठी है और यह सच्चा है।" (27)
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☆    फिर जब देखा कि उसका कुर्ता पीछे से फटा है तो उसने कहा, "यह तुम स्त्रियों की चाल है। निश्चय ही तुम्हारी चाल बड़े ग़ज़ब की होती है। (28)
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☆    यूसुफ़! इस मामले को जाने दे और स्त्री तू अपने गुनाह की माफ़ी माँग। निस्संदेह ख़ता तेरी ही है।" (29)
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☆   नगर की स्त्रियाँ कहने लगीं, "अज़ीज़ की पत्नी अपने नवयुवक ग़ुलाम पर डोरे डालना चाहती है। वह प्रेम-प्रेरणा से उसके मन में घर कर गया है। हम तो उसे देख रहे हैं कि वह खुली ग़लती में पड़ गई है।" (30)
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☆    उसने जब उनकी मक्कारी की बातें सुनीं तो उन्हें बुला भेजा और उनमें से हरेक के लिए आसन सुसज्जित किया और उनमें से हरेक को एक छुरी दी। उसने (यूसुफ़ से) कहा, "इनके सामने आजाओ।" फिर जब स्त्रियों ने उसे देखा तो वे उसकी बड़ाई से दंग रह गईं। उन्होंने अपने हाथ घायल कर लिए और कहने लगीं,"अल्लाह की पनाह! यह कोई मनुष्य नहीं। यह तो कोई प्रतिष्ठित फ़रिश्ता है।" (31)
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☆    वह बोली, "यह वही है जिसके विषय में तुम मुझे मलामत कर रही थीं। हाँ, मैंने इसे रिझाना चाहा था, किन्तु यह बचा रहा। और यदि इसने न किया जो मैं इससे कहती हूँ तो यह अवश्य क़ैद किया जाएगा और अपमानित होगा।" (32)
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☆    उसने कहा, "मेरे रब! जिसकी ओर ये सब मुझे बुला रही हैं, उससे अधिक तो मुझे क़ैद ही पसन्द है, यदि तूने उनके दाँव-घात को मुझसे न टाला तो मैं उनकी और झुक जाऊँगा और निरे आवेग के वशीभूत हो जाऊँगा।" (33)
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☆    अतः उसके रब ने उसकी सुन लीऔर उसकी ओर से उन स्त्रियों के दाँव-घात को टाल दिया। निस्संदेह वह सब कुछ सुनता, जानता है। (34)
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☆    फिर उन्हें, इसके पश्चात कि वे निशानियाँ देख चुके थे, यह सूझा कि उसे एक अवधि के लिएक़ैद कर दें। (35)
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☆   कारागार में दो नव युवकों ने भी उसके साथ प्रवेश किया। उनमें से एक ने कहा, "मैंने स्वप्न देखा है कि मैं शराब निचोड़ रहा हूँ।" दूसरे ने कहा, "मैंने देखा कि मैं अपने सिर पर रोटियाँ उठाए हुए हूँ, जिनको पक्षी खा रहे हैं। हमेंइसका अर्थ बता दीजिए। हमें तोआप बहुत ही नेक नज़र आते हैं।"(36)
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☆    उसने कहा, "जो भोजन तुम्हें मिला करता है वह तुम्हारे पास नहीं आ पाएगा, उसके तुम्हारे पास आने से पहले ही मैं तुम्हें इसका अर्थ बता दूँगा। यह उन बातों में से है, जो मेरे रब ने मुझे सिखाई हैं। मैंने तो उन लोगोंका तरीक़ा छोड़कर, जो अल्लाह को नहीं मानते और जो आख़िरत (परलोक) का इनकार करते हैं, (37)
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☆    अपने पूर्वज इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब का तरीक़ा अपनाया है। हमसे यह नहीं हो सकता कि हम अल्लाह के साथ किसी चीज़ को साझी ठहराएँ। यहहमपर और लोगों पर अल्लाह का अनुग्रह है। किन्तु अधिकतर लोग आभार नहीं प्रकट करते। (38)
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☆   ऐ कारागर के मेरे साथियो! क्या अलग-अलग बहुत-से रब अच्छे हैं या अकेला अल्लाह जिसका प्रभुत्व सबपर है? (39)
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☆     तुम उसके सिवा जिनकी भी बन्दगी करते हो वे तो बस निरे नाम हैं, जो तुमने रख छोड़े हैं और तुम्हारे बाप-दादा ने।उनके लिए अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा। सत्ता और अधिकार तो बस अल्लाह का है। उसने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो। यही सीधा, सच्चा दीन (धर्म) है,किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते। (40)
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☆    ऐ कारागार के मेरे दोनों साथियो! तुममें से एक तो अपने स्वामी को मदिरापान कराएगा; रहा दूसरा तो उसे सूली पर चढ़ाया जाएगा और पक्षी उसका सिर खाएँगे। फ़ैसला हो चुका उस बात का जिसके विषय में तुम मुझसे पूछ रहे हो।" (41)
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☆    उन दोनों में से जिसके विषय में उसने समझा था कि वह रिहा हो जाएगा, उससे कहा,"अपने स्वामी से मेरी चर्चा करना।" किन्तु शैतान ने अपने स्वामी से उसकी चर्चा करना भुलवा दिया। अतः वह (यूसुफ़) कई वर्ष तक कारागार ही में रहा। (42)
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☆    फिर ऐसा हुआ कि सम्राट ने कहा, "मैंने स्वप्न देखा है किसात मोटी गायों को सात दुबली गायें खा रही हैं और सात बालें हरी हैं और दूसरी (सात सूखी) । ऐ सरदारो! यदि तुम स्वप्न का अर्थ बताते हो, तो मुझे मेरे इस स्वप्न के सम्बन्ध में बताओ।" (43)
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☆    उन्होंने कहा, "ये तो सम्भ्रमित स्वप्न हैं। हम ऐसे स्वप्न का अर्थ नहीं जानते।" (44)
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☆    इतने में दोनों में से जो रिहा हो गया था और एक अर्से केबाद उसे याद आया तो वह बोला,"मैं इसका अर्थ तुम्हें बताता हूँ। ज़रा मुझे (यूसुफ़ के पास) भेज दीजिए।" (45)
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☆   "यूसुफ़, ऐ सत्यवान! हमें इसका अर्थ बता कि सात मोटी गायें हैं, जिन्हें सात दुबलीगायें खा रही हैं और सात हरी बालें हैं और दूसरी (सात) सूखी, ताकि मैं लोगों के पास लौटकर जाऊँ कि वे जान लें।" (46)
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☆    उसने कहा, "सात वर्ष तक तुमव्यवहारतः खेती करते रहोगे। फिर तुम जो फ़सल काटो तो थोड़े हिस्से के सिवा जो तुम्हारे खाने के काम आए शेष को उसकी बाली ही में रहने देना। (47))
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☆    फिर उसके पश्चात सात कठिन वर्ष आएँगे जो वे सब खा जाएँगे जो तुमने उनके लिए पहले से इकट्ठा कर रखा होगा, सिवाय उस थोड़े-से हिस्से के जो तुम सुरक्षित कर लोगे। (48)
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☆    फिर उसके पश्चात एक वर्ष ऐसा आएगा, जिसमें वर्षा द्वारा लोगों की फ़रियाद सुन ली जाएगी और उसमें वे रस निचोड़ेंगे।" (49)
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☆   सम्राट ने कहा, "उसे मेरे पास ले आओ।" किन्तु जब दूत उसके पास पहुँचा तो उसने कहा,"अपने स्वामी के पास वापस जाओ और उससे पूछो कि उन स्त्रियोंका क्या मामला है, जिन्होंने अपने हाथ घायल कर लिए थे। निस्संदेह मेरा रब उनकी मक्कारी को भली-भाँति जानता है।" (50)
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☆    उसने कहा, "तुम स्त्रियों का क्या हाल था, जब तुमने यूसुफ़ को रिझाने की चेष्टा की थी?" उन्होंने कहा, "पाक है अल्लाह! हम उसमें कोई बुराई नहीं जानते हैं।" अज़ीज़ की स्त्री बोल उठी, "अब तो सत्य प्रकट हो गया है। मैंने ही उसे रिझाना चाहा था। वह तो बिलकुल सच्चा है।" (51)
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☆   "यह इसलिए कि वह जान ले कि मैंने गुप्त रूप से उसके साथ विश्वासघात नहीं किया है और यह कि अल्लाह विश्वासघातियोंकी चाल को चलने नहीं देता।(52)
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☆   मैं यह नहीं कहता कि मैं बरी हूँ - जी तो बुराई पर उभारता ही है - यदि मेरा रब ही दया करे तो बात और है। निश्चय ही मेरा रब बहुत क्षमाशील, दयावान है।"(53)
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☆    सम्राट ने कहा, "उसे मेरे पास ले आओ! मैं उसे अपने लिए ख़ास कर लूँगा।" जब उसने उससे बात-चीत की तो उसने कहा,"निस्संदेह आज तुम हमारे यहाँ विश्वसनीय अधिकार प्राप्त व्यक्ति हो।" (54)
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☆     उसने कहा, "इस भू-भाग के ख़जानों पर मुझे नियुक्त कर दीजिए। निश्चय ही मैं रक्षक और ज्ञानवान हूँ।" (55)
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☆    इस प्रकार हमने यूसुफ़ को उस भू-भाग में अधिकार प्रदान किया कि वह उसमें जहाँ चाहे अपनी जगह बनाए। हम जिसे चाहतेहैं उसे अपनी दया का पात्र बनाते हैं। उत्तमकारों का बदला हम अकारथ नहीं जाने देते। (56)
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☆   और ईमान लानेवालों और डर रखनेवालों के लिए आख़िरत का बदला इससे कहीं उत्तम है। (57)
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☆  फिर ऐसा हुआ कि यूसुफ़ के भाई आए और उसके सामने उपस्थितहुए, उसने तो उन्हें पहचान लिया, किन्तु वे उससे अपरिचितरहे। (58)
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☆   जब उसने उनके लिए उनका सामान तैयार करा दिया तो कहा,"बाप की ओर से जो तुम्हारा एक भाई है, उसे मेरे पास लाना। क्या देखते नहीं कि मैं पूरी माप से देता हूँ और मैं अच्छा आतिशेय भी हूँ?(59)
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☆     किन्तु यदि तुम उसे मेरे पास न लाए तो फिर तुम्हारे लिए मेरे यहाँ कोई माप (ग़ल्ला) नहीं और तुम मेरे पासआना भी मत।" (60)
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☆   वे बोले, "हम उसके लिए उसके बाप को राज़ी करने की कोशिश करेंगे और हम यह काम अवश्य करेंगे।" (61)
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☆    उसने अपने सेवकों से कहा,"इनका दिया हुआ माल इनके सामानमें रख दो कि जब ये अपने घरवालों की ओर लौटें तो इसे पहचान लें, ताकि ये फिर लौटकर आएँ।" (62)
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☆   फिर जब वे अपने बाप के पास लौटकर गए तो कहा, "ऐ हमारे बाप!(अनाज की) माप हमसे रोक दी गई है। अतः हमारे भाई को हमारे साथ भेज दीजिए, ताकि हम माप भरलाएँ; और हम उसकी रक्षा के लिएतो मौजूद ही हैं।"(63)
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☆    उसने कहा, "क्या मैं उसके मामले में तुमपर वैसा ही भरोसा करूँ जैसा इससे पहले उसके भाई के मामले में तुमपर भरोसा कर चुका हूँ? हाँ, अल्लाह ही सबसे अच्छा रक्षक है और वह सबसे बढ़कर दयावान है।" (64)
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☆   जब उन्होंने अपना सामान खोला, तो उन्होंने अपना माल अपनी ओर वापस किया हुआ पाया। वे बोले, "ऐ हमारे बाप, हमें औरक्या चाहिए! यह हमारा माल भी तो हमें लौटा दिया गया है। अब हम अपने घरवालों के लिए खाद्य-सामग्री लाएँगे और अपने भाई की रक्षा भी करेंगे।और एक ऊँट के बोझभर और अधिक लेंगे। इतना माप (ग़ल्ला) मिल जाना तो बिलकुल आसान है।"(65)
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☆    उसने कहा, "मैं उसे तुम्हारे साथ कदापि नहीं भेज सकता। जब तक कि तुम अल्लाह को गवाह बनाकर मुझे पक्का वचन न दो कि तुम उसे मेरे पास अवश्य लाओगे, यह और बात है कि तुम घिर जाओ।" फिर जब उन्होंने उसे अपना वचन दे दिया तो उसने कहा, "हम जो कुछ कर रहे हैं वह अल्लाह के हवाले है।" (66)
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☆   उसने यह भी कहा, "ऐ मेरे बेटो! एक द्वार से प्रवेश न करना, बल्कि विभिन्न द्वारों से प्रवेश करना यद्यपि मैं अल्लाह के मुक़ाबले में तुम्हारे कुछ काम नहीं आ सकताआदेश तो बस अल्लाह ही का चलता है। उसी पर मैंने भरोसा किया और भरोसा करनेवालों को उसी परभरोसा करना चाहिए।"(67)
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☆    और जब उन्होंने प्रवेश किया जिस तरह से उनके बाप ने उन्हें आदेश दिया था - अल्लाह की ओर से होनेवाली किसी चीज़ को वह उनसे हटा नहीं सकता था। बस याक़ूब के जी की एक इच्छा थी, जो उसने पूरी कर ली। और निस्संदेह वह ज्ञानवान था, क्योंकि हमने उसे ज्ञान प्रदान किया था; किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं - (68)
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☆    और जब उन्होंने यूसुफ़ के यहाँ प्रवेश किया तो उसने अपने भाई को अपने पास जगह दी और कहा, "मैं तेरा भाई हूँ। जो कुछ ये करते रहे हैं, अब तू उसपर दुखी न हो।" (69)
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☆    फिर जब उनका सामान तैयार कर दिया तो अपने भाई के सामान में पानी पीने का प्याला रख दिया। फिर एक पुकारनेवाले ने पुकारकर कहा, "ऐ क़ाफ़िलेवालो! निश्चय ही तुम चोर हो।" (70)
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☆     वे उनकी ओर रुख़ करते हुए बोले, "तुम्हारी क्या चीज़ खो गई है?" (71)
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☆    उन्होंने कहा, "शाही पैमाना हमें नहीं मिल रहा है।जो व्यक्ति उसे ला दे उसको एक ऊँट का बोझभर ग़ल्ला इनाम मिलेगा। मैं इसकी ज़िम्मेदारी लेता हूँ।" (72)
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☆    वे कहने लगे, "अल्लाह की क़सम! तुम लोग जानते ही हो कि हम इस भू-भाग में बिगाड़ पैदा करने नहीं आए हैं और न हम चोर हैं।" (73)
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☆    उन्होंने कहा, "यदि तुम झूठे सिद्ध हुए तो फिर उसका दंड क्या है?" (74)
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☆    वे बोले, "उसका दंड यह है कि जिसके सामान में वह मिले वही उसका बदला ठहराया जाए। हमअत्याचारियों को ऐसा ही दंड देते हैं।" (75)
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☆   फिर उसके भाई की ख़ुरजी से पहले उनकी ख़ुरजियाँ देखनी शुरू कीं; फिर उसके भाई की ख़ुरजी से उसे बरामद कर लिया।इस प्रकार हमने यूसुफ़ के लिएउपाय किया। वह शाही क़ानून केअनुसार अपने भाई को प्राप्त नहीं कर सकता था। बल्कि अल्लाह ही की इच्छा लागू है। हम जिसको चाहें उसके दर्जे ऊँचे कर दें। और प्रत्येक ज्ञानवान से ऊपर एक ज्ञानवान मौजूद है।(76)
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☆     उन्होंने कहा, "यदि यह चोरी करता है तो चोरी तो इससे पहले इसका एक भाई भी कर चुका है।" किन्तु यूसुफ़ ने इसे अपने जी ही में रखा और उनपर प्रकट नहीं किया। उसने कहा,"मक़ाम की दृष्टि से तुम अत्यन्त बुरे हो। जो कुछ तुम बताते हो, अल्लाह को उसका पूरा ज्ञान है।" (77)
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☆    उन्होंने कहा, "ऐ अज़ीज़! इसका बाप बहुत ही बूढ़ा है। इसलिए इसके स्थान पर हममें सेकिसी को रख लीजिए। हमारी दृष्टि में तो आप बड़े ही सुकर्मी हैं।" (78)
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☆    उसने कहा, "इस बात से अल्लाह पनाह में रखे कि जिसकेपास हमने अपना माल पाया है, उसे छोड़कर हम किसी दूसरे को रखें। फिर तो हम अत्याचारी ठहरेंगे।" (79)
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☆   तो जब वे उससे निराश हो गए तो परामर्श करने के लिए अलग जा बैठे। उनमें जो बड़ा था, वहकहने लगा, "क्या तुम जानते नहीं कि तुम्हारा बाप अल्लाह के नाम पर तुमसे वचन ले चुका है और उसको जो इससे पहले यूसुफ़ के मामले में तुमसे क़सूर हो चुका है? मैं तो इस भू-भाग से कदापि टलने का नहीं जब तक कि मेरे बाप मुझे अनुमति न दें या अल्लाह ही मेरे हक़ में कोई फ़ैसला कर दे। और वही सबसे अच्छा फ़ैसलाकरनेवाला है।(80)
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☆    तुम अपने बाप के पास लौटकर जाओ और कहो, "ऐ हमारे बाप! आपकेबेटे ने चोरी की है। हमने तो वही कहा जो हमें मालूम हो सका,परोक्ष तो हमारी दृष्टि में था नहीं। (81)
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☆    आप उस बस्ती से पूछ लीजिए जहाँ हम थे और उस क़ाफ़िले से भी जिसके साथ होकर हम आए। निस्संदेह हम बिलकुल सच्चे हैं।" (82)
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☆   उसने कहा, "नहीं, बल्कि तुम्हारे जी ही ने तुम्हें पट्टी पढ़ाकर एक बात बना दी है। अब धैर्य से काम लेना ही उत्तम है! बहुत सम्भव है कि अल्लाह उन सबको मेरे पास ले आए। वह तो सर्वज्ञ, अत्यन्त तत्वदर्शी है।"(83)
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☆  उसने उनकी ओर से मुख फेर लिया और कहने लगा, "हाय अफ़सोस, यूसुफ़ की जुदाई पर!" और ग़म के मारे उसकी आँखें सफ़ेद पड़ गईं और वह घुटा जा रहा था।(84)
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☆    उन्होंने कहा, "अल्लाह की क़सम! आप तो यूसुफ़ ही की याद में लगे रहेंगे, यहाँ तक कि घुलकर रहेंगे या प्राण ही त्याग देंगे।" (85)
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☆    उसने कहा, "मैं तो अपनी परेशानी और अपने ग़म की शिकायत अल्लाह ही से करता हूँऔर अल्लाह की ओर से जो मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते। (86)
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☆    ऐ मेरे बेटो! जाओ और यूसुफ़और उसके भाई की टोह लगाओ और अल्लाह की सदयता से निराश न हो। अल्लाह की सदयता से तो केवल कुफ़्र करनेवाले ही निराश होते हैं।" (87)
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☆    फिर जब वे उसके पास उपस्थित हुए तो कहा, "ऐ अज़ीज़! हमें और हमारे घरवालों को बहुत तकलीफ़ पहुँची है और हम कुछ तुच्छ-सी पूँजी लेकर आए हैं, किन्तु आप हमें पूरी-पूरी माप प्रदान करें। और हमें दान दें। निश्चय ही दान करनेवालों को बदला अल्लाह देता है।" (88)
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☆    उसने कहा, "क्या तुम्हें यह भी मालूम है कि जब तुम आवेगके वशीभूत थे तो यूसुफ़ और उसके भाई के साथ तुमने क्या किया था?" (89)
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☆    वे बोल पड़े, "क्या यूसुफ़ आप ही हैं?" उसने कहा, "मैं ही यूसुफ़ हूँ और यह मेरा भाई है। अल्लाह ने हमपर उपकार किया है। सच तो यह है कि जो कोई डर रखे और धैर्य से काम लेतो अल्लाह भी उत्तमकारों का बदला अकारथ नहीं करता।" (90)
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☆   उन्होंने कहा, "अल्लाह की क़सम! आपको अल्लाह ने हमारे मुक़ाबले में पसन्द किया और निश्चय ही चूक तो हमसे हुई।" (91)
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☆    उसने कहा, "आज तुमपर कोई आरोप नहीं। अल्लाह तुम्हें क्षमा करे। वह सबसे बढ़कर दयावान है। (92)
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☆    मेरा यह कुर्ता ले जाओ और इसे मेरे बाप के मुख पर डाल दो। उनकी नेत्र-ज्योति लौट आएगी, फिर अपने सब घरवालों को मेरे यहाँ ले आओ।" (93)
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☆    इधर जब क़ाफ़िला चला तो उनके बाप ने कहा, "यदि तुम मुझे बहकी बातें करनेवाला न समझो तो मुझे तो यूसुफ़ की महक आ रही है।" (94)
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☆    वे बोले, "अल्लाह की क़सम! आप तो अभी तक अपनी उसी पुरानी भ्रांति ही में पड़े हुए हैं।" (95)
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☆     फिर जब शुभ सूचना देनेवालाआया तो उसने उस (कुर्ते) को उसके मुँह पर डाल दिया और तत्क्षण उसकी नेत्र-ज्योति लौट आई। उसने कहा, "क्या मैंनेतुमसे कहा नहीं था कि अल्लाह की ओर से जो मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते।" (96)
_______________________________
☆    वे बोले, "ऐ हमारे बाप! आप हमारे गुनाहों की क्षमा के लिए प्रार्थना करें। वास्तव में चूक हमसे ही हुई।" (97)
_______________________________
☆    उसने कहा, "मैं अपने रब से तुम्हारे लिए क्षमा की प्रार्थना करूँगा। वह बहुत क्षमाशील, दयावान है।" (98)
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☆    फिर जब वे यूसुफ़ के पास पहुँचे तो उसने अपने माँ-बाप को ख़ास अपने पास जगह दी औऱ कहा, "तुम सब नगर में प्रवेश करो। अल्लाह ने चाहा तो यह प्रवेश निश्चिन्तता के साथ होगा।" (99)
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☆   उसने अपने माँ-बाप को ऊँची जगह सिंहासन पर बिठाया और सब उसके आगे सजदे मे गिर पड़े। इस अवसर पर उसने कहा, "ऐ मेरे बाप! यह मेरे विगत स्वप्न का साकार रूप है। इसे मेरे रब ने सच बना दिया। और उसने मुझपर उपकार किया जब मुझे क़ैदख़ाने से निकाला और आप लोगों को देहात से इसके पश्चात ले आया, जबकि शैतान ने मेरे और भाइयों के बीच फ़साद डलवा दिया था। निस्संदेह मेरा रब जो चाहता है उसके लिए सूक्ष्म उपाय करता है। वास्तव में वही सर्वज्ञ, अत्यन्त तत्वदर्शी है।(100)
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☆ मेरे रब! तुने मुझे राज्य प्रदान किया और मुझे घटनाओं और बातों के निष्कर्ष तक पहुँचना सिखाया। आकाश और धरती के पैदा करनेवाले! दुनिया और आख़िरत में तू ही मेरा संरक्षक मित्र है। तू मुझे इस दशा में उठा कि मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ और मुझे अच्छे लोगों के साथ मिला।"(101)
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☆    ये परोक्ष की ख़बरे हैं जिनकी हम तुम्हारी ओर प्रकाशना कर रहे हैं। तुम तो उनके पास नहीं थे, जब उन्होंने अपने मामले को पक्का करके षड्यंत्र किया था। (102)
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☆    किन्तु चाहे तुम कितना ही चाहो, अधिकतर लोग तो मानेंगे नहीं। (103)
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☆    तुम उनसे इसका कोई बदला भी नहीं माँगते। यह तो सारे संसार के लिए बस एक अनुस्मरण है। (104)
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☆    आकाशों और धरती में कितनी ही निशानियाँ हैं, जिनपर से वे इस तरह गुज़र जाते हैं कि उनकी ओर वे ध्यान ही नहीं देते। (105)
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☆   इनमें अधिकतर लोग अल्लाह को मानते भी हैं तो इस तरह कि वे साझी भी ठहराते हैं। (106)
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☆    क्या वे इस बात से निश्चिन्त हैं कि अल्लाह की कोई यातना उन्हें ढँक ले या सहसा वह घड़ी ही उनपर आ जाए, जबकि वे बिलकुल बेख़बर हों? (107)
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☆    कह दो, "यही मेरा मार्ग है।मैं अल्लाह की ओर बुलाता हूँ।मैं स्वयं भी पूर्ण प्रकाश में हूँ और मेरे अनुयायी भी - महिमावान है अल्लाह! - और मैं कदापि बहुदेववादी नहीं।" (108)
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☆    तुमसे पहले भी हमने जिनको रसूल बनाकर भेजा, वे सब बस्तियों के रहनेवाले पुरुष ही थे। हम उनकी ओर प्रकाशना करते रहे - फिर क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उनका कैसा परिणाम हुआ, जो उनसे पहले गुज़रे हैं? निश्चयही आख़िरत का घर ही डर रखनेवालों के लिए सर्वोत्तम है। तो क्या तुम समझते नहीं? -(109)
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☆    यहाँ तक कि जब वे रसूल निराश होने लगे और वे समझने लगे कि उनसे झूठ कहा गया था किसहसा उन्हें हमारी सहायता पहुँच गई। फिर हमने जिसे चाहाबचा लिया। किन्तु अपराधी लोगों पर से तो हमारी यातना टलती ही नहीं। (110)
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☆    निश्चय ही उनकी कथाओं में बुद्धि और समझ रखनेवालों के लिए एक शिक्षाप्रद सामग्री है। यह कोई घड़ी हुई बात नहीं है, बल्कि यह अपने से पूर्व कीपुष्टि में है, और हर चीज़ का विस्तार और ईमान लानेवाले लोगों के लिए मार्ग-दर्शन और दयालुता है। (111)
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